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मंगलवार, 24 अक्तूबर 2017

गीत "बुखार ही बुखार है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नशा है चढ़ा हुआ, खुमार ही खुमार है।
तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।

मुश्किलों में हैं सभी, फिर भी धुन में मस्त है,
ताप के प्रकोप से, आज सभी ग्रस्त हैं,
आन-बान, शान-दान, स्वार्थ में शुमार है।
तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।

हो गये उलट-पलट, वायदे समाज के,
दीमकों ने चाट लिए, कायदे रिवाज़ के,
प्रीत के विमान पर, सम्पदा सवार है।
तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।

अंजुमन पे आज, सारा तन्त्र है टिका हुआ,
आज उसी वाटिका का, हर सुमन बिका हुआ,
गुल गुलाम बन गये, खार पर निखार है।
तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।

झूठ के प्रभाव से, सत्य है डरा हुआ,
बेबसी के भाव से, आदमी मरा हुआ,
राम के ही देश में, राम बेकरार है।
तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।

सोमवार, 23 अक्तूबर 2017

दोहे "दो आँखों की रीत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


कह देती हैं सहज ही, सुख-दुख-करुणा-प्यार।
कुदरत ने हमको दिया, आँखों का उपहार।।
--
आँखें नश्वर देह का, बेशकीमती अंग।
बिना रौशनी के लगे, सारा जग बेरंग।।
--
मिल जाती है आँख जब, तब आ जाता चैन।
गैरों को अपना करें, चंचल चितवन नैन।।
--
दुनिया में होती अलग, दो आँखों की रीत।
होती आँखें चार तो, बढ़ जाती है प्रीत।।
--
पोथी में जिनका नहीं, कोई भी उल्लेख।
आँखें पढ़ना जानती, वो सारे अभिलेख।।
--
माता-पत्नी-बहन से, कैसा हो व्यवहार।
आँखें ही पहचानतीं, रिश्तों का आकार।।
--
सम्बन्धों में हो रहा, कहाँ-कहाँ व्यापार।
आँखों से होता प्रकट, घृणा और सत्कार।।

रविवार, 22 अक्तूबर 2017

गीत "गुरूनानक का दरबार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


ये गुरूनानक का दरबार।

दर्शन कर लो बारम्बार।।
IMG_2434IMG_2444लगा हुआ नानकमत्ता में, दीवाली का मेला,
कृपाणों की दूकानें और फूलों का है ठेला,
मनचाहा ले लो उपहार।
दर्शन कर लो बारम्बार।।
IMG_2437देखो-देखो कितने सुन्दर कंघे, कड़े-खिलौने,
मन को आकर्षित करते हैं सुन्दर चित्र सलोने,
सामानों की है भरमार।
दर्शन कर लो बारम्बार।।

IMG_2441गड़े हुए हैं इस मेले में ऊँचे-ऊँचे झूले,
देख-देख इनको बच्चों के मन खुशियो से फूले,
उत्सव से सबको है प्यार।
दर्शन कर लो बारम्बार।।
IMG_2443IMG_2439हीं मौत का कुआँ कहीं पर सर्कस लगा अनोखा,
इन्द्रज़ाल को दिखला कर जादूगर देता धोखा,
करतब दिखलाती हैं कार।
दर्शन कर लो बारम्बार।।

IMG_2445उत्सव के इस महाकुम्भ में छाई हैं तरुणाई,
मनचाही चीजें लेने को आये लोग लुगाई,
उमड़ा है मानों संसार।
दर्शन कर लो बारम्बार।।

IMG_2446पाषाणो को छाँट रहे हैं मानुष हट्टे-कट्टे,
गाँवों से महिलाएँ आयीं लेने को सिलबट्टे,

थोड़े दिन का है बाज़ार।
दर्शन कर लो बारम्बार।।

शनिवार, 21 अक्तूबर 2017

दोहे भइयादूज "पावन प्यार-दुलार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

यज्ञ-हवन करके बहन, माँग रही वरदान।
भइया का यमदेवता, करना तुम कल्याण।।
--
भाई बहन के प्यार का, भइया-दोयज पर्व।
अपने-अपने भाई पर, हर बहना को गर्व।।
--
तिलक दूज का कर रहीं, सारी बहनें आज।
सभी भाइयों के बने, सारे बिगड़े काज।।
--
रोली-अक्षत-पुष्प का, पूजा का ले थाल।
बहन आरती कर रही, मंगल दीपक बाल।।
--
एक बरस में एक दिन, आता ये त्यौहार।
अपनी रक्षा का बहन, माँग रही उपहार।।
--
जब तक सूरज-चन्द्रमा, तब तक जीवित प्यार।
दौलत से मत तोलना, पावन प्यार-दुलार।।

गीत "भइया दूज का तिलक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आज भइया दूज के पावन अवसर पर 
अपना एक पुराना गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ!
मेरे भइया तुम्हारी हो लम्बी उमर,
 कर रही हूँ प्रभू से यही कामना।
लग जाये किसी की न तुमको नजर,
दूज के इस तिलक में यही भावना।।

चन्द्रमा की कला की तरह तुम बढ़ो,
उन्नति के शिखर पर हमेशा चढ़ो,
कष्ट और क्लेश से हो नही सामना।
दूज के इस तिलक में यही भावना।।


थालियाँ रोली चन्दन की सजती रहें,
सुख की शहनाइयाँ रोज बजती रहें,
 हों सफल भाइयों की सभी साधना।
दूज के इस तिलक में यही भावना।। 

रोशनी से भरे दीप जलते रहें,
नेह के सिन्धु नयनों में पलते रहें,
आज बहनों की हैं ये ही आराधना।
दूज के इस तिलक में यही भावना।।

शुक्रवार, 20 अक्तूबर 2017

दोहे "माटी के ये दीप" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

झिलमिल-झिलमिल जल रहे, माटी के ये दीप।
देवताओं के चित्र के, रखना इन्हें समीप।।
--
दीपों की दीपावली, देती है सन्देश।
घर-आँगन के साथ में, रौशन हो परिवेश।।
--
पाकर बाती-नेह को, लुटा रहा है नूर।
नन्हा दीपक कर रहा, अन्धकार को दूर।।
--
लछमी और गणेश के, रहें शारदा साथ।
चरणों में इनके सदा, रोज झुकाओ माथ।।
--
कभी विदेशी माल का, करना मत उपयोग।
सदा स्वदेशी का करो, जीवन में उपभोग।।
--
मेरे भारतवासियों, ऐसा करो चरित्र।
दौलत अपने देश की, रखो देश में मित्र।।

गीत "भाईदूज के अवसर पर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


भइया की लम्बी आयु का,
माँग रहीं है यम से वर।
मंगलतिलक लगाती बहना,
भाईदूज के अवसर पर।।

चन्द्रकला की तरह बढ़ो,
तुम उन्नति के सोपान चढ़ो।
शीतल-धवल रौशनी से,
आलोकित कर दो आँगन-घर।
मंगलतिलक लगाती बहना,
भाईदूज के अवसर पर।।

इक आँगन में खेले-कूदे,
इक आँगन में बड़े हुए,
मात-पिता की पकड़ अंगुली,
धरती पर हम खड़े हुए,
नहीं भूलना भइया मुझको,
तीज और त्यौहारों पर।
मंगलतिलक लगाती बहना,
भाईदूज के अवसर पर।।

कभी न भइया के उपवन में,
फैला तम का डेरा हो,
जीवन की खिलती बगिया में,
कभी न गम का घेरा हो,
सदा रहे मुस्कान सहज,
मेरे भाई के आनन पर।
मंगलतिलक लगाती बहना,
भाईदूज के अवसर पर।।

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