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रविवार, 22 अप्रैल 2018

गीत "घर सब बनाना जानते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

वेदना के "रूप" को पहचानते हैं। 
धूप में घर सब बनाना जानते हैं।।

भावनाओं पर कड़ा पहरा रहा, 
दुःख से नाता बड़ा गहरा रहा, 
मीत इनको ज़िन्दग़ी का मानते हैं। 
धूप में घर सब बनाना जानते हैं।। 

काल का तो चक्र चलता जा रहा है
 
वक़्त ऐसे  ही निकलता जा रहा, 
ख़ाक क्यों दरबार की हम छानते हैं।
धूप में घर सब बनाना जानते हैं।। 

शूल के ही साथ रहते फूल हैं
, 
एक दूजे के लिए अनुकूल हैं, 
बैर काँटों से नहीं हम ठानते हैं। 
धूप में घर सब बनाना जानते हैं।।

रूप तो इक रोज़ ढल ही जायेगा, 
आँच में शीशा पिघल ही जायेगा, 
तीर खुद पर किसलिए हम तानते हैं। 
धूप में घर सब बनाना जानते हैं।।

शनिवार, 21 अप्रैल 2018

दोहे "पृथ्वी दिवस-बंजर हुई जमीन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

एक साल में एक दिन, धरती का त्यौहार।
कैसे धरती दिवस का, सपना हो साकार।१।
--
कंकरीट जबसे बना,  जीवन का आधार।
धरती की तब से हुई, बड़ी करारी हार।२।
--
पेड़ कट गये धरा के, बंजर हुई जमीन।
प्राणवायु घटने लगी, छाया हुई विलीन।३।
--
नैसर्गिक अनुभाव का, होने लगा अभाव।
दुनिया में होने लगे, मौसस में बदलाव।४।
--
शस्य-श्यामला धरा को, किया प्रदूषित आज।
कुदरत से खिलवाड़ अब, करने लगा समाज।५।
--
नकली सुमनों में नहीं, होता है मकरन्द।
कृत्रिमता में खोजता, मनुज आज आनन्द।६।
--
जहर बेचकर लोग अब, लगे बढ़ाने कोष।
औरों के सिर मढ़ रहे, अपने सारे दोष।७।
--
ओछे कर्मों से हुए, हम कितने मजबूर।
आज मजे से दूर हैं, कृषक और मजदूर।८।
--
जबसे जंगल में बिछा, कंकरीट का जाल।
धरती पर आने लगे, चक्रवात-भूचाल।९।
--
अब तो मुझे बचाइए, धरती कहे पुकार।
पेड़ लगाकर कीजिए, धरती का शृंगार।१०।

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2018

दोहे "बातों में है बात" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सभी तरह की निकलती, बातों में से बात।
बातें देतीं हैं बता, इंसानी औकात।।
--
माप नहीं सकते कभी, बातों का अनुपात।
रोके से रुकती नहीं, जब चलती हैं बात।।
--
जनसेवक हैं बाँटते, बातों में खैरात।
अच्छी लगती सभी को, चिकनी-चुपड़ी बात।।
--
नुक्कड़-नुक्कड़ पर जुड़ी, छोटी-बड़ी जमात।
ठलवे करते हैं जहाँ, बेमतलब की बात।।
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बद से बदतर हो रहे, दुनिया के हालात।
लेकिन मुद्दों पर नहीं, होती कोई बात।।
--
बादल नभ पर छा गये, दिन लगता है रात।
गरमी में बरसात की, लोग कर रहे बात।।
--
कूड़े-करकट से भरे, नगर और देहात।
मगर दिखावे के लिए, होती सुथरी बात।।
--
भूल गये हैं लोग अब, कॉपी-कलम-दवात।
करते हैं सब आजकल, कम्प्यूटर की बात।।
--
जीवन के पर्याय हैं, झगड़े-झंझावात।
बैठ आमने-सामने, सुलझाओ सब बात।।
--
बातों से मिलती नहीं, हमको कभी निजात।
कहिए मन की बात अब, बातों में है बात।।

गुरुवार, 19 अप्रैल 2018

गीत "गुलमोहर! फिर भी हँसते जाते हो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सहते हो सन्ताप गुलमोहर!
फिर भी हँसते जाते हो।
लू के गरम थपेड़े खाकर,
अपना “रूप” दिखाते हो।।

ताप धरा का बढ़ा मगर,
गदराई तुम्हारी डाली है,
पात-पात में नजर आ रही,
नवयौवन की लाली है,
दुख में कैसे मुस्काते हैं,
सबक यही सिखलाते हो।
लू के गरम थपेड़े खाकर,
अपना “रूप” दिखाते हो।।

गरमी और पसीने से,
जब कोमल तन अकुलाते हैं,
पथिक तुम्हारी छाया में तब,
पल-दो पल सुस्ताते हैं,
जब-जब सूरज आग उगलता,
तब तुम खिलते जाते हो।
लू के गरम थपेड़े खाकर,
अपना “रूप” दिखाते हो।।

योगी और तपस्वी जैसा,
ज्ञान कहाँ से पाया है?
तपकर तप करने का,
निर्मल भाव कहाँ से है?
सड़क किनारे खड़े हुए,
तुम सबको पास बुलाते हो।
लू के गरम थपेड़े खाकर,
अपना “रूप” दिखाते हो।।

अरुणलालिमा जैसा तुमने,
अपना भेष बनाया है,
प्यारे-प्यारे फूलों से,
सबका ही मन भरमाया है,
लालरंग संकेत क्रोध का,
मगर प्यार दिखलाते हो?
लू के गरम थपेड़े खाकर,
अपना “रूप” दिखाते हो।।

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

दोहे "अँगरेजी का जोर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

पग-पग पर है घेरती, सौतन जिसको आज।
उस भाषा के जाल में, जकड़ा हुआ समाज।।
--
कविता हिन्दी की मगर, अँगरेजी का जोर।
छिपा हुआ बैठा अभी, दाढ़ी में है चोर।।
--
अँगरेजी का दिलों पर, छाया हुआ बुखार।
कदम-कदम पर हो रही, हिन्दी की ही हार।।
--
आसन पर सब बैठ कर, करते हैं आखेट।
भाषा के तो नाम पर, होते लाग-लपेट।।
--
देवनागरी की हुई, मिट्टी आज पलीद।
अब चमचों के राज में, बची नहीं उम्मीद।।

सोमवार, 16 अप्रैल 2018

बालगीत "ककड़ी बिकतीं फड़-ठेलों पर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

लम्बी-लम्बी हरी मुलायम।
ककड़ी मोह रही सबका मन।।
कुछ होती हल्के रंगों की,
कुछ होती हैं बहुरंगी सी,
कुछ होती हैं सीधी सच्ची,
कुछ तिरछी हैं बेढंगी सी,
ककड़ी खाने से हो जाता,
शीतल-शीतल मन का उपवन।
ककड़ी मोह रही सबका मन।।
नदी किनारे पालेजों में, 
ककड़ी लदी हुईं बेलों पर,
ककड़ी बिकतीं हैं मेलों में,
हाट-गाँव में, फड़-ठेलों पर,
यह रोगों को दूर भगाती,
यह मौसम का फल है अनुपम।
ककड़ी मोह रही सबका मन।।
आता जब अप्रैल महीना,
गर्म-गर्म जब लू चलती हैं,
तापमान दिन का बढ़ जाता,
गर्मी से धरती जलती है,
ऐसे मौसम में सबका ही,
ककड़ी खाने को करता मन।
ककड़ी मोह रही सबका मन।। 

रविवार, 15 अप्रैल 2018

आलेख "चुनाव लड़ना बस की बात नहीं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

चुनाव लड़ना 
क्या आम आदमी के बस की बात है?
मेरे विचार से तो बिल्कुल नहीं! 
   क्योंकि वार्ड मेम्बर से लेकर विधानसभा और लोकसभा तक के चुनाव में धन का जिस प्रकार से खुला खेल होता है उसे दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतन्त्र का ईमानदार व्यक्ति झेल ही नहीं सकता। कारण यह है कि आम आदमी के पास इतना धन होता ही नहीं है।
    साफ-सुथरे और निष्पक्ष चुनाव होने का दावा निर्वाचन आयोग करता तो है मगर उसमें मेरे विचार से एक प्रतिशत सच्चाई भी नहीं है। यद्यपि निर्वाचन आयोग ने अपनी अहम भूमिका का निर्वहन करते हुए अब काफी कठोर कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। मगर इन नियम-कानूनों की धज्जियाँ भी प्रत्याशियों द्वारा खुले आम उड़ाई जाती ही हैं।
    आज विधान सभा के चुनाव के लिए एक प्रत्याशी द्वारा खर्च की अधिकतम धनराशि मेरे विचार से लाखों रुपये तय की हुई है। लेकिन मैंने देखा है कि यहाँ धनवान और बाहूबली प्रत्याशियों द्वारा इससे कई गुना धन खर्च किया जाता है वहीं निर्धन और ईमानदार प्रत्याशी अपना घर-मकान और जमीन तक भी गिरवी रख कर और लाखों खर्च करके भी चुनाव नहीं जीत पाता है।
    सुना तो यह है कि मान्यता प्राप्त राष्ट्रीयदल अपने प्रत्याशी को कई लाख रूपये नकद धनराशि तो देती ही हैं इसके अलावा इससे कई गुना खर्च वो विज्ञापनों और चुनाव प्रचार सामग्री में ही चुनाव की भेंट चढ़ा देती हैं। इसके साथ-साथ सत्ताधारी दल की सहायता परदे के पीछे से उद्योगपति भी करते ही हैं।
    आम आदमी किसी भी राजनीतिक दल की प्राथमिक सदस्यता इसीलिए ग्रहण करता है कि किसी दिन उसकी भी बारी आयेगी और वो भी चुनाव लड़कर सदन में जायेगा। मगर देखा यह गया है कि हर बार मान्यताप्राप्त राजनीतिक दल अपने पुराने दिग्गजों को ही चुनाव मैदान में उतारते हैं। जबकि होना यह चाहिए कि एक व्यक्ति को केवल एक बार ही चुनाव लड़ने का मौका दिया जाना चाहिए। इससे न तो वंशवाद का ठप्पा किसी दल पर लगेगा और न ही भ्रष्ट लोग शासन में आयेंगे।
    आज हमारे जाने-माने सन्त और सामाजिकता का झण्डा लहराने वाले सामाजिक लोग कभी लोकपाल की बात करते हैं और कभी विदेशों में काले धन को वापिस लाने की बात करते हैं।
    मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि वो यह आवाज क्यों नहीं उठाते कि एक व्यक्ति को केवल एक बार ही चुनाव लड़ने दिया जाए।
    माना कि बड़ी दिक्कतें आयेगी जो यह होंगी कि नये चेहरों को सदन चलाने का प्रशिक्षण कौन देगा? लेकिन इसके लिए भी उपाय है कि दस प्रतिशत साफ-सुथरी छवि के ईमानदार और कानूनविद् लोगों को मनोनीत किया जाए जो नये विधायकों और सांसदों को प्रशिक्षित करें।
    चुनाव कराना सरकार का काम है और इस काम को अंजाम देता है निर्वाचन आयोग!
     अतः निर्वाचन आयोग को चाहिए कि वह निर्धारित तिथि को प्रत्याशियों के  नामांकन कराते ही उनसे चुनाव प्रचार के लिए आवश्यक धनराशि जमा करा ले। इसके बाद इन प्रत्याशियों को अपने अधीन करके चुनाव सम्पन्न होने तक देश या विदेश के ऐसे भाग में भेज दिया जाए जहाँ से यह लोग मतदाताओं के सम्पर्क में विल्कुल भी न रहें।
     आयोग द्वारा इनके द्वारा जमा की गई धनराशि से समानरूप से स्वयं प्रचार कराया जाए। क्योंकि आज भारत की जनता साक्षर है। उसे अपने विवेक से वोट करने की सुविधा दी जानी चाहिए।
     इसके बाद जो व्यक्ति सरकार की सदन में आयेंगे वो वास्तव में जनता के प्रतिनिधि होंगे। फिर न तो प्रत्याशी के 11 लाख खर्च होंगे और नही कोई फर्जी हिसाब बनाने को बाध्य होना पड़ेगा। आज जाहे कितनी भी मँहगाई की मार हो लेकिन मैं समझता हूँ कि दो लाख रुपयों में चुनाव आयोग प्रत्याशी के चुनाव को अपने सरकारी स्तर से सम्पन्न करा सकता है।
     आशान्वित हूँ कि कभी ऐसा समय भी अवश्य आयेगा ही।

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