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गुरुवार, 25 मई 2017

बालकविता "फल वाले बिरुए उपजाओ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जब गर्मी का मौसम आता,
सूरज तन-मन को झुलसाता। 
तन से टप-टप बहे पसीना
जीना दूभर होता जाता। 
 
ऐसे मौसम में पेड़ों पर
फल छा जाते हैं रंग-रंगीले। 
उमस मिटाते हैं तन-मन की
खाने में हैं बहुत रसीले। 
 
ककड़ी-खीरा औ' खरबूजा
प्यास बुझाता है तरबूजा।
जामुन पाचन करने वाली,
लीची मीठे रस का कूजा। 
 
आड़ू और खुमानी भी तो
सबके ही मन को भाते हैं।
आलूचा और काफल भी तो
हमें बहुत ही ललचाते हैं।
 
कुसुम दहकते हैं बुराँश पर
लगता मोहक यह नज़ारा।
इन फूलों के रस का शर्बत
शीतल करता बदन हमारा।
 
आँगन और बगीचों में कुछ,
फल वाले बिरुए उपजाओ।
सुख से रहना अगर चाहते
पेड़ लगाओ-धरा बचाओ।

बुधवार, 24 मई 2017

दोहे "मन है सदा जवान" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


मन में तो है कलुषता, होठों पर हरि नाम।
काम-काम को छल रहा, अब तो आठों याम।।
--
लटक रहे हैं कबर में, जिनके आधे पाँव।
वो ही ज्यादा फेंकते, इश्क-मुश्क के दाँव।।
--
मन की बात न मानिए, मन है सदा जवान।
तन की हालत देखिए, जिसमें भरी थकान।।
--
नख-शिख को मत देखिए, होगा हिया अशान्त।
भोगवाद को त्याग कर, रक्खो मन को शान्त।।
--
रोज फेसबुक पर लिखो, अपने नवल विचार।
अच्छी सूरत देख कर, तज दो मलिन विकार।।
--
सीख बड़ों से ज्ञान को, छोटों को दो ज्ञान।
जीवन ढलती शाम है, दिन का है अवसान।।
--
अनुभव अपने बाँटिए, सुधरेगा परिवेश।
नवयुग को अब दीजिए, जीवन का सन्देश।।
--
भरा हुआ है सिन्धु में, सभी तरह का माल।
जो भी जिसको चाहिए, देगा अन्तरजाल।।
--
महादेव बन जाइए, करके विष का पान।
धरा और आकाश में, देंगे सब सम्मान।।

ग़ज़ल "हिमायत कौन करता है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

खुदा की आजकल, सच्ची इबादत कौन करता है
बिना मतलब ज़ईफों से, मुहब्बत कौन करता है

शहादत दी जिन्होंने, देश को आज़ाद करने को,
मगर उनकी मज़ारों पर, इनायत कौन करता है

सियासत में फक़त है, वोट का रिश्ता रियाया से
यहाँ मज़लूम लोगों की, हिमायत कौन करता है

मिला ओहदा उज़ागर हो गयी, करतूत अब सारी
वतन को चाटने में, अब रियायत कौन करता है

ग़रज़ जब भी पड़ी तो, ले कटोरा भीख का आये
मुसीबत में गरीबों की, हिफ़ाजत कौन करता है

सजीले “रूप” की चाहत में, गुनगुन गा रहे भँवरे
कमल के बिन सरोवर पर, कवायद कौन करता है

मंगलवार, 23 मई 2017

ग़ज़ल "उलझा है ताना-बाना" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जीवन की हकीकत का, इतना सा है फसाना
खुद ही जुटाना पड़ता, दुनिया में आबोदाना

सुख के सभी हैं साथी, दुख का कोई न संगी
रोते हैं जब अकेले, हँसता है कुल जमाना

घर की तलाश में ही, दर-दर भटक रहे हैं
खानाबदोश का तो, होता नहीं ठिकाना

अपना नहीं बनाया, कोई भी आशियाना
लेकिन लगा रहे हैं, वो रोज शामियाना

मंजिल की चाह में ही, दर-दर भटक रहे हैं
बेरंग जिन्दगी का, उलझा है ताना-बाना

 अशआर हैं अधूरे, ग़ज़लें नहीं मुकम्मल
दुनिया समझ रही है, लहजा है शायराना

हो हुनर पास में तो, भर लो तमाम झोली
मालिक के दोजहाँ में, भरपूर है खजाना

लड़ते नहीं कभी भी, बगिया में फूल-काँटे
सीखो चमन में जाकर, आपस में सुर मिलाना

दिल की नजर से देखो, मत रूप-रंग परखो
रच कर नया तराना, महफिल में गुनगुनाना
  

सोमवार, 22 मई 2017

गीत "घुटता गला सुवास का" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

आम नहीं अब रहा आम, वो तो है केवल खास का।
नजर नहीं आता बैंगन भी, यहाँ कोई विश्वास का।।

अब तो भिण्डीलौकी-तोरी संकर नस्लों वाली हैं,
कद्दू के पिछलग्गू भी अब खाने लगे दलाली हैं,
टिण्डा और करेला भी तो, पात्र बना परिहास का।
नजर नहीं आता बैंगन भी, यहाँ कोई विश्वास का।।

केला-सेब-पपीता भी तो, खाने लगे दवाई को,
बच्चे तरस रहें हैं कब से, खोया और मलाई को,
जूस मिलावट वाला पाकर, घुटता गला सुवास का।
  नजर नहीं आता बैंगन भी यहाँ कोई विश्वास का।।

खरबूजा-तरबूज सभी के, भाव चढ़े बाजारों में,
धनवानों ने कैद करी हैं, लीची कारागारों में,
नहीं मिठाई में आता, नैसर्गिक स्वाद मिठास का।
नजर नहीं आता बैंगन भी, यहाँ कोई विश्वास का।।

रविवार, 21 मई 2017

दोहे "सबकी अपनी टेक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
रौशन रजनी को करे, वो चन्दा है एक।
धवल चाँदनी पर टिकी, नवयुगलों की टेक।।
--
फैले हैं संसार में, यूँ तो पन्थ अनेक।
सबके दिल में जो बसे, वो नारायण एक।।
--
रूप-रंग सबका अलग, होता भिन्न विवेक।
उर मन्दिर को छोड़कर, मन्दिर में अभिषेक।।
--
कविता-कानन में मिले, हमको छन्द अनेक।
सबकी अपनी मापनी, सबकी अपनी टेक।।
--
एक मुखी रुद्राक्ष तो, मिलना है आसान।
लेकिन दुर्लभ जगत में, एक मुखी इंसान।।
--
सात सुरों से ही बने, दुनिया में संगीत।
जग में आवागमन की, रही एक ही रीत।।
--
चरैवेति की सीख को. सरिताओं से सीख।
सागर भी जन के लिए, जिनसे माँगे भीख।।
--
सहज-सरल पगडण्डियाँ, खोज रहा हर एक।
पन्थ भले ही हों अलग, लेकिन मंजिल एक।।

गीत "इस जीवन की भोर तुम्हारे हाथों में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आसमान का छोर, तुम्हारे हाथो में।
कनकइया की डोर तुम्हारे हाथो में।।

लहराती-बलखाती, पेंग बढ़ाती है,
नीलगगन में ऊँची उड़ती जाती है,
होती भावविभोर तुम्हारे हाथो में।
कनकइया की डोर तुम्हारे हाथो में।।

वसुन्धरा की प्यास बुझाती है गंगा,
पावन गंगाजल करता तन-मन चंगा,
सरगम का मृदु शोर तुम्हारे हाथों में।।
कनकइया की डोर तुम्हारे हाथो में।।

उपवन में कलिकाएँ जब मुस्काती हैं,
भ्रमर और तितली को महक सुहाती है,
इस जीवन की भोर तुम्हारे हाथों में।
कनकइया की डोर तुम्हारे हाथो में।।

प्रणय-प्रेम के बिना अधूरी पावस है,
बिन मयंक के छायी घोर अमावस है,
चन्दा और चकोर तुम्हारे हाथो में।
कनकइया की डोर तुम्हारे हाथो में।।

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