"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

लोड हो रहा है. . .

समर्थक

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

"कुहरे की मार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

कुहरे की फुहार से,
ठहर गया जन-जीवन।
शीत की मार से,काँप रहा मन और तन।



माता जी लेटी हैं,
ओढ़कर रजाई।
काका ने तसले में,
लकड़ियाँ सुलगाई। 
--
गलियाँ हैं सूनी,
सड़कें वीरान हैं।
टोपों से ढके हुए,
लोगों के कान हैं। 
--
खाने में खिचड़ी,
मटर का पुलाव है।
जगह-जगह जल रहा,
आग का अलाव है। 
--
राजनीतिक भिक्षु,
हुो रहे बेचैन हैं।
मत के जुगाड़ में,
चौकन्ने नैन हैं।

विलम्बित उड़ाने हैं,
ट्रेन सभी लेट हैं।
ठण्डक से दिनचर्या,
हुई मटियामेट है।
--
मँहगाई की आग में,
सेंकते रहो बदन।
कुहरे की फुहार से,
ठहर गया जन-जीवन...। 

गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

गीत "कुहरा पसरा है आँगन में" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मित्रों।
मेरी एक रचना
त्रयमासिक पत्रिका
“शैल-सूत्र”
के अंक अक्टूबर-दिसम्बर में
पृष्ठ-25 पर प्रकाशित हुई थी।
आपके अवलोकनार्थ इस रचना को
ब्लॉग पर भी प्रकाशित कर रहा हूँ।
सुख का सूरज नहीं गगन में
कुहरा पसरा है आँगन में

पाला पड़ता शीत बरसता
सर्दी में सब बदन ठिठुरता
तन ढकने को वस्त्र न पूरे
निर्धनता में जीवन मरता
पौधे मुरझाये गुशन में
कुहरा पसरा है आँगन में

आपाधापी और वितण्डा
गैस बिना चूल्हा है ठण्डा
लोकतन्त्र का आजादी तो
बन्धक है अब राजभवन में
कुहरा पसरा है आँगन में

विदुरनीति का हुआ सफाया
दुर्नीती ने पाँव जमाया
आदर्शों को धता बताकर
देश लूटकर सबने खाया
खर-पतवार उगी उपवन में
कुहरा पसरा है आँगन में

बुधवार, 7 दिसंबर 2016

दोहे "थर-थर काँपे देह" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कुहरे ने सूरज ढकाथर-थर काँपे देह।
पर्वत पर हिमपात है, नहीं बरसता मेह।१।
--

कल तक छोटे वस्त्र थेफैशन की थी होड़।
लेकिन सरदी में सभीरहे शाल को ओढ़।२।
--
ऊनी कपड़े पहनकरमिलता है आराम।
बच्चे-बूढ़े सेंकतेअपनी शीतल चाम।३।
--
ख़ास मजे को लूटतेव्याकुल होते आम।
गाजर का हलवा यहीखाते सुबहो-शाम।३।
--
आज घरेलू गैस केबढ़े हुए हैं भाव।
लकड़ी मिलती हैं नहींकैसे जले अलाव।४।
--
हाड़ काँपता शीत सेठिठुरा देश-समाज।
गीजर-हीटर क्या करेंबिन बिजली के आज।५।
--
बाजारों में हो गयामहँगा आटा-दाल।
निर्धन का तो हो रहाजीना आज मुहाल।६।
--
गुणवानों की जेब मेंकौड़ी नहीं छदाम।
कंगाली में हो रहापरमारथ का काम।७।
--
कविता लिखकर हो गयाजीवन मटियामेट।
दोहे लिखने से नहींभरता पापी पेट।८।
--
दुनिया भर में चल रहाअस्त्र-शस्त्र का खेल।
कैसे इन हालात मेंहो आपस में मेल।९।
--
कलमकार रचना करेंसन्त करें उपदेश।
आपस में मिल कर रहेंदेते ये सन्देश।१०।

मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

गीत "दुनियादारी जाम हो गई" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नीलगगन पर कुहरा छाया, दोपहरी में शाम हो गई।
शीतलता के कारण सारी, दुनियादारी जाम हो गई।।

गैस जलानेवाली ग़ायब, लकड़ी गायब बाज़ारों से,
कैसे जलें अलाव? यही तो पूछ रहे हैं सरकारों से,
जीवन को ढोनेवाली अब, काया भी नाकाम हो गई।
शीतलता के कारण सारीदुनियादारी जाम हो गई।।

खुदरा व्यापारी जायेंगे, परदेशी व्यापार करेंगे
आम आदमी को लूटेंगे, अपनी झोली खूब भरेंगे
दलदल में फँस गया सफीना, धारा तो गुमनाम हो गई।
जीवन को ढोनेवाली अब, काया भी नाकाम हो गई।

सस्ती हुई ज़िन्दग़ी कितनी, बढ़ी मौत पर मँहगाई है,
बिल्लों ने कुर्सी को पाकर, दूध-मलाई ही खाई है,
शीला की लुट गई जवानी, मुन्नी भी बदनाम हो गई।
जीवन को ढोनेवाली अब, काया भी नाकाम हो गई।

सोमवार, 5 दिसंबर 2016

दोहे "सिन्दूरी परिवेश" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


सालगिरह पर ब्याह की, पाकर शुभसन्देश।
जीवन जीने का हुआ, सिन्दूरी परिवेश।।
--
कर्म करूँगा तब तलक, जब तक घट में प्राण।
पा जाऊँगा तन नया, जब होगा निर्वाण।।
--
आना-जाना ही यहाँ, जीवन का है मर्म।
वैसा फल मिलता उसे, जैसे जिसके कर्म।।
--
चुनकर गंगा घाट पर, पत्थर रहा तराश।
किसी मोड़ पर भी कभी, होता नहीं निराश।।
--
कामनाओं का विश्व में, कोई ओर न छोर।
स्वारथ के बाजार में, भरे पड़े हैं चोर।।
--
हम भीतर के राम को, नहीं सके पहचान।
खोज रहे हैं लोग सब, मन्दिर में भगवान।।
--
जगतनियन्ता ईश का, कण-कण में है वास।
मन से अनुभव कीजिए, उसकी मधुर सुवास।।

रविवार, 4 दिसंबर 2016

दोहागीत "पाँच दिसम्बर-वैवाहिक जीवन के तैंतालीस वर्ष पूर्ण"

मृग के जैसी चाल अब, बनी बैल की चाल।
धीरे-धीरे कट रहे, दिवस-महीने-साल।।
--
वैवाहिक जीवन हुआ, अब तैंतालिस वर्ष।
जीवन के संग्राम में, किया बहुत संघर्ष।।
पात्र देख कर शिष्य को, ज्ञानी देता ज्ञान।
श्रम-सेवा परमार्थ से, मिलता जग में मान।।
जो है सरल सुभाव का, वो ही है खुशहाल।
धीरे-धीरे कट रहे, दिवस-महीने-साल।
--
सजनी घर के काम में, बँटा रही है हाथ।
चैन-अमन से कट रहा, जीवन उसके साथ।।
अपने-अपने क्षेत्र में, करते सब उद्योग।
पुत्र-पौत्र-बहुएँ सभी, करती हैं सहयोग।।
जीवन के संगीत में, मिलते हैं सुर-ताल।
धीरे-धीरे कट रहे, दिवस-महीने-साल।
--
सरल-तरल है जिन्दगी, बहती सुख की धार।
एक नेक मुझको मिला, सुन्दर सा परिवार।।
होते रहते हैं कभी, आपस में मतभेद।
लेकिन रखते हैं नहीं, घरवाले मनभेद।।
हल कर देता है समय, सारे कठिन सवाल।
धीरे-धीरे कट रहे, दिवस-महीने-साल।
--
जीवन के पथ में भरे, कदम-कदम पर मोड़।
जिस पथ से मंजिल मिले, कभी न उसको छोड़।।
बैठे गंगा घाट पर, सन्त और शैतान।
देना सदा सुपात्र को, धन में से कुछ दान।।
करके दान कुपात्र को, होता बहुत मलाल।
धीरे-धीरे कट रहे, दिवस-महीने-साल।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails