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बुधवार, 24 अगस्त 2016

दोहे "आ जाओ गोपाल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

कृष्ण पक्ष की अष्टमी, भादों का है मास।
भारतमाता के लिए, दिन यह सबसे खास।
--
गोप-गोपियाँ कृष्ण को, कब से रहे पुकार।
जल्दी से आ जाइए, नन्द पिता के द्वार।।
--
भारत में गो-वंश का, बहुत बुरा है हाल।
गौवें तुम्हें पुकारतीं, आ जाओ गोपाल।।
--
धर्म पराजित हो रहा, बढ़ता जाता पाप।
जनता सारी है दुखी, बढ़ा जगत में ताप।।
--
आहत वृक्ष कदम्ब का, तकता है आकाश।
अपनी शीतल छाँव में, बंशी रहा तलाश।।
--
बरसाने की गोपियाँ, कितनी है बेचैन।
विरह-व्यथा में बरसते, उनके निशि-दिन नैन।।
--
गूँज रहा है युगों से, कृष्ण मनोहर नाम।
बृज की सूनी धरा में, आ जाओ अब श्याम।।
--
मनमोहन की हो रही, जग में जय-जयकार।
मन्दिर में लगने लगी, फिर से आज कतार।।

मंगलवार, 23 अगस्त 2016

गीत "शब्दों के मौन निमन्त्रण" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


शब्दों के मौन निमन्त्रण से,
बिन डोर खिचें सब आते हैं।
मुद्दत से टूटे रिश्ते भी,
सम्बन्धों में बंध जाते हैं।।

इनके बिन बात अधूरी है,
नजदीकी में भी दूरी है,
दुनिया दारी में पड़ करके,
बतियाना बहुत जरूरी है,
मकड़ी के नाजुक जालों में,
बलवान सिंह फंद जाते हैं।

मुद्दत से टूटे रिश्ते भी,
सम्बन्धों में बंध जाते हैं।।

पशु-पक्षी और संगी-साथी,
शब्दों से मन को भरमाते,
तीखे शब्दों से मीत सभी,
पल भर में दुश्मन बन जाते,
पहले तोलोफिर कुछ बोलो,
स्वर मधुर छन्द बन जाते हैं।

मुद्दत से टूटे रिश्ते भी,
सम्बन्धों में बँध जाते हैं।।

सोमवार, 22 अगस्त 2016

गीत "बहुत कठिन जीवन की राहें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


आज बहुत है नया-नवेला,
कल को होगा यही पुराना।
जीवन के इस कालचक्र में,
लगा रहेगा आना-जाना।।

गोल-गोल है दुनिया सारी,
चन्दा-सूरज गोल-गोल है।
गोल-गोल में घूम रहे सब,
गोल-गोल की यही पोल है।
घूम-घूमकर, सारे जग को,
बना रहा है काल निशाना।
जीवन के इस कालचक्र में,
लगा रहेगा आना-जाना।।

दिन दूनी औ रात चौगुनी,
बढ़ती जातीं अभिलाषाएँ।
देश-काल के साथ बदलतीं,
पाप-पुण्य की परिभाषाएँ।
धन संचय की होड़ लगी है,
लेकिन साथ नहीं कुछ जाना।
जीवन के इस कालचक्र में,
लगा रहेगा आना-जाना।।

कहीं सरल हैं कहीं वक्र हैं,
बहुत कठिन जीवन की राहें।
मंजिल पर जानेवालों की,
छोटे पथ पर लगी निगाहें।
लेकिन लक्ष्य उसे ही मिलता,
जिसने सही मार्ग पहचाना।
जीवन के इस कालचक्र में,
लगा रहेगा आना-जाना।।

रविवार, 21 अगस्त 2016

ग़ज़ल "आ गई गुलशन में फिर बहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मयंक
निन्यानबे के फेर में आया हूँ कई बार
रहमत औ’ करम ने तेरी, मुझको लिया उबार

ऐसे भी हैं कई बशर, अटक गये हैं जो
श्रम करके मैंने अपना, मुकद्दर लिया सँवार

कल तक थी जो कमी, वो पूरी हो गई है आज,
शबनम में आ गया है, मोतियों सा अब निखार

चलता ही रहा जो, वो पा गया है मंजिलें
पतझड़ के बाद आ गई, गुलशन में फिर बहार

नदियाँ मुकाम पा के, समन्दर सी हो गईं
थे बेकरार जो कभी, उनको मिला क़रार

माहताब को दी रौशनी, जब आफताब ने,
बहने लगी है रात में, शीतल-सुखद बयार

चेहरा चमक उठा, दमक उठा है रूप भी
फिर से हरा-भरा हुआ, उजड़ा हुआ दयार

शनिवार, 20 अगस्त 2016

गीत "सुमनो को सब नोच रहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

चौकीदारी मिली खेत की, अन्धे-गूँगे-बहरो को।
चोटी पर बैठे मचान की, लगा रहे हैं पहरो को।।

घात लगाकर मित्र-पड़ोसी, धरा हमारी लील रहे,
पर बापू के मौन-मनस्वी, देते उनको ढील रहे,
बोल न पाये, ना सुन पाये, ना पढ़ पाये चेहरो को।।
चोटी पर बैठे मचान की, लगा रहे हैं पहरो को।।

कैसे भरे तिजोरी अपनी, दिवस-रैन ये सोच रहे,
अपने पैने नाखूनों से, सुमनो को सब नोच रहे,
गाँवों को वीरान बनाकर, रौशन करते शहरो को।
चोटी पर बैठे मचान की, लगा रहे हैं पहरो को।।

चीर पर्वतों की छाती को, बहती चंचल धारा है,
गहरी नदिया दूर किनारा, कोई नहीं सहारा है,
चप्पू लेकर दूर खड़े ये, चले थामने लहरो को।
चोटी पर बैठे मचान की, लगा रहे हैं पहरो को।।

शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

गीत "आदत में अब चाय समायी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
 परदेशों से चलकर आई।
चाय हमारे मन को भाई।।

कैसे जुड़ा चाय से नाता,
मैं इसका इतिहास बताता,
शुरू-शुरू में इसकी प्याली,
गोरों ने थी मुफ्त पिलाई।
चाय हमारे मन को भाई।।

जीवन का अंग ये बनी अब,
बड़े चाव से पीते हैं सब,
बिना चाय के फीकी लगती,
बिस्कुट-बर्फी और मलाई।
चाय हमारे मन को भाई।।

बच्चों को नहीं दूध सुहाता,
चाय देख मन खुश हो जाता,
गर्म चाय की चुस्की लेकर,
बीच-बीच में मठरी खाई।
चाय हमारे मन को भाई।।

इसके बिना अधूरा स्वागत,
नाखुश हो कर जाता आगत.
वशीभूत हम हुए चाय के, 
आदत में अब चाय समायी।
चाय हमारे मन को भाई।।

गुरुवार, 18 अगस्त 2016

गीत "भाई-बहन का प्यार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

हरियाला सावन ले आया, नेह भरा उपहार।
आया राखी का त्यौहार!
आया राखी का त्यौहार!!

यही कामना करती मन में, गूँजे घर में शहनाई,
खुद चलकर बहना के द्वारे, आये उसका भाई,
कच्चे धागों में उमड़ा है भाई-बहन का प्यार।
आया राखी का त्यौहार!
आया राखी का त्यौहार!!

तिलक लगाती और खिलाती, उसको स्वयं मिठाई,
आज किसी के भइया की, ना सूनी रहे कलाई,
भाई के ही कन्धों पर, होता रक्षा का भार।
आया राखी का त्यौहार!
आया राखी का त्यौहार!!

पौध धान के जैसी बिटिया, बढ़ी कहीं पर-कहीं पली,
बाबुल के अँगने को तजकर, अन्जाने के संग चली,
रस्म-रिवाज़ों ने खोला है, नूतन घर का द्वार।
आया राखी का त्यौहार!
आया राखी का त्यौहार!!

रखती दोनों घर की लज्जा, सदा निभाती नाता,
राखी-भइयादूज, बहन-बेटी की याद दिलाता,
भइया मुझको भूल न जाना, विनती बारम्बार।
आया राखी का त्यौहार!
आया राखी का त्यौहार!!

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