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सोमवार, 18 दिसंबर 2017

दोहे "ढकी ढोल की पोल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सुर, नर, मुनि के ज्ञान की, जब ढल जाती धूप।
छत्र-सिंहासन के बिना, रंक कहाते भूप।।

बिना धूप के खेत में, फसल नहीं उग पाय।
बारिश-गरमी-शीत को, भुवनभास्कर लाय।।

शैल शिखर उत्तुंग पर, जब पड़ती है धूप।
हिमजल ले सरिता बहें, ले गंगा का रूप।।

नष्ट करे दुर्गन्ध को, शीलन देय हटाय।
पूर्व दिशा के द्वार पर, रोग कभी ना आय।।

खग-मृग, कोयल-काग को, सुख देती है धूप।
उपवन और बसन्त का, यह सवाँरती रूप।।

गेहूँ उगता ग़ज़ल सासरसों करे किलोल।
बन्द गले के सूट मेंढकी ढोल की पोल।।

मौसम आकर्षित करे, हमको अपनी ओर।
कनकइया डग-मग करे, होकर भावविभोर।।

कड़क नहीं माँझा रहा, नाज़ुक सी है डोर।
पतंग उड़ाने को चला, बिन बाँधे ही छोर।।

पत्रक जब पीला हुआ, हरियाली नहीं पाय।
जाने कब शाखाओं से, पके पान झड़ जाय।।
  

रविवार, 17 दिसंबर 2017

ग़ज़ल "वचनों के कंगाल सुनो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

भाषण से बहलाने वालों, वचनों के कंगाल सुनो
माल मुफ्त का खाने वालों, जंगल के शृंगाल सुनो

बिना खाद-पानी के कैसे, खेतों में बिरुए पनपें
ठेकेदारों ने उन सबका हड़प लिया है माल सुनो

प्राण निछावर किये जिन्होंने आजादी दिलवाई थी
उन सबके वंशज गुलशन में आज हुए बेहाल सुनो

घेर लिये हैं चाँद-सितारे धरती के खद्योतों ने
पावस में खामोश हो गये कोकिल और मराल सुनो

भोली सोनचिरैय्यों के, चीलों ने गहने झपट लिए
अवश-विवश गौरय्या के अब कैसे सुधरें हाल सुनो

सीधे-सादे श्रम करते, मक्कारों की पौबारह है
अत्याचारों की चक्की में, पिसते माँ के लाल सुनो

दुनिया में बदनाम आजकल लोकतन्त्र का “रूप” हुआ
जाल बुन रहे हैं जनसेवक हो करके वाचाल सुनो
  

शनिवार, 16 दिसंबर 2017

गीत "लाचार हुआ सारा समाज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

हम चन्दा की क्या बात कहें,
सूरज को भी तम ने घेरा।
आशाओं के गुलशन में अब,
कुण्ठाओं ने डाला डेरा।।

गंगा-यमुना, भूषा-भाषा,
सबकी बदली हैं परिभाषा,
दूषित है वातावरण आज,
लाचार हुआ सारा समाज,
रब का बँटवारा कर कहते,
ये है तेरा, ये है मेरा।
आशाओं के गुलशन में अब,
कुण्ठाओं ने डाला डेरा।।

ममता में स्वार्थ समाया है,
दुनिया में सब कुछ माया है,
मन में कोरा छल-कपट भरा,
भाई-चारे में खोट मरा,
मर्यादाओं के उपवन में,
आवारा भँवरों का फेरा।
आशाओं के गुलशन में अब,
कुण्ठाओं ने डाला डेरा।।

तितली-मधुमक्खी आती हैं,
लेकिन हताश हो जाती हैं,
अब गन्ध नहीं सुमनों में है,
हरियाली नहीं वनों में है,
गुरू ज्ञान किसे दें बतलाओ,
है कोई नहीं यहाँ चेरा।
आशाओं के गुलशन में अब,
कुण्ठाओं ने डाला डेरा।।

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

गीत "कैसे नियमित यजन करूँ मैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)

सब कुछ वही पुराना सा है!
कैसे नूतन सृजन करूँ मैं?

कभी चाँदनी-कभी अँधेरा,
लगा रहे सब अपना फेरा,
जग झंझावातों का डेरा,
असुरों ने मन्दिर को घेरा,
देवालय में भीतर जाकर,
कैसे अपना भजन करूँ मैं?
कैसे नूतन सृजन करूँ मैं?

वो ही राग-वही है गाना,
लाऊँ कहाँ से नया तराना,
पथ तो है जाना-पहचाना,
लेकिन है खुदगर्ज़ ज़माना,
घी-सामग्री-समिधा के बिन,
कैसे नियमित यजन करूँ मैं?
कैसे नूतन सृजन करूँ मैं?

बना छलावा पूजन-वन्दन
मात्र दिखावा है अभिनन्दन
चारों ओर मचा है क्रन्दन,
बिखर रहे सामाजिक बन्धन,
परिजन ही करते अपमानित,
कैसे उनको सुजन करूँ मैं?
कैसे नूतन सृजन करूँ मैं?

गुलशन में पादप लड़ते हैं,
कमल सरोवर में सड़ते हैं,
कदम नहीं आगे बढ़ते हैं,
पावों में कण्टक गड़ते है,
पतझड़ की मारी बगिया में,
कैसे मन को सुमन करूँ मैं?
कैसे नूतन सृजन करूँ मैं?

गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

ग़ज़ल "पाप गंगा में बहाने चल दिये" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


आज वो फिर से नहाने चल दिये
पाप गंगा में बहाने चल दिये

पाप की गठरी उठाकर शीश पर
पुण्य मन्दिर में कमाने चल दिये

जिन्दगी भर जो भटकते ही रहे
रास्ते अब वो बताने चल दिये

दूसरों को बाँटते हैं ज्ञान जो
वो चरस का दम लगाने चल दिये

हाथ फैला भीख हैं जो माँगते
भाग्य लोगों का बनाने चल दिये

कैद करके राम औ रहमान को
अमन के पौधे उगाने चल दिये

रात में जुगनू बने बहुरूपिये
रूप लोगों को दिखाने चल दिये

बुधवार, 13 दिसंबर 2017

बालगीत "मौसम के अनुकूल बया ने, अपना नीड़ बनाया है"


कल केवल कुहरा आया था,
अब बादल भी छाया है।
हाय भयानक इस सर्दी ने,
सबका हाड़ कँपाया है।।

भीनी-भीनी पड़ी फुहारें,
झीना-झीना उजियारा।
आग सेंकता सरजू दादा,
दिन में छाया अँधियारा।
कॉफी और चाय का प्याला,
सबसे ज्यादा भाया है। 
हाय भयानक इस सर्दी ने,
सबका हाड़ कँपाया है।।

आलू और शकरकन्दी भी,
सबके मन को भाते हैं।
गर्म-गर्म गाजर का हलवा,
खुश होकर सब खाते हैं।
कम्बल-लोई और कोट से,
कोमल बदन छिपाया है। 
हाय भयानक इस सर्दी ने,
सबका हाड़ कँपाया है।।

हीटर-गीजर और अँगीठी,
गज़करेवड़ी-मूँगफली।
गर्म समोसेटिक्की-डोसा,
अच्छी लगती हैं इडली।
मौसम के अनुकूल बया ने,
अपना नीड़ बनाया है।

हाय भयानक इस सर्दी ने,
सबका हाड़ कँपाया है।।

मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

"मैंने सब-कुछ हार दिया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों!
कई वर्ष पूर्व यह गीत रचा था।
आज आप सबके साथ साझा कर रहा हूँ।
छला प्यार में जिसने मुझको,
मैंने उससे प्यार किया है।
जीवन के इस दाँव-पेंच में,
मैंने सब-कुछ हार दिया है।।

जब राहों पर कदम बढ़ाया,
काँटों ने उलझाया मुझको।
जब गुलशन के पास गया तो,
फूलों ने ठुकराया मुझको।
जिसको दिल की दौलत सौंपी,
उसने ही प्रतिकार लिया है।
जीवन के इस दाँव-पेंच में,
मैंने सब-कुछ हार दिया है।।

झंझावातों-तूफानों ने,
जब-जब नौका को भटकाया।
तब-तब बहुत सावधानी से,
खुद मैंने पतवार चलाया।
तट पर आकर डूबी नौका,
सागर गहरा पार किया है।
जीवन के इस दाँव-पेंच में,
मैंने सब-कुछ हार दिया है।।

बनकर कृष्ण-कन्हैया कब से,
खोज रहा था मैं राधा को।
अपनी पगडण्डी की कब से,
हटा रहा था मैं बाधा को।
ठगा मोहनी मुस्कानों ने,
मैंने जब मनुहार किया है।
जीवन के इस दाँव-पेंच में,
मैंने सब-कुछ हार दिया है।।

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