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रविवार, 26 मार्च 2017

गीतिका "पथ उनको क्या भटकायेगा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

पथ उनको क्या भटकायेगा, जो अपनी खुद राह बनाते
भूले-भटके राही को वो, उसकी मंजिल तक पहुँचाते

अल्फाज़ों के चतुर चितेरे, धीर-वीर-गम्भीर सुख़नवर
जहाँ न पहुँचें सूरज-चन्दा, वो उस मंजर तक हो आते

अमर नहीं है काया-माया, लेकिन शब्द अमर होते हैं
शब्द धरोहर हैं समाज की, दिशाहीन को दिशा दिखाते

विरह-व्यथा की भट्टी में, जब तपकर शब्द निकलते हैं
पाषाणों के भीतर जाकर, वो सीधे दिल को छू जाते

चाहे ग़ज़ल-गीत हो, या फिर दोहा या रूबाई हो
वजन बराबर हो तो, अपना असर बराबर दिखलाते

असली “रूप” दिखाता दर्पण, जो औकात बताता सबको
जो काँटों में पले-बढ़े हैं, वो ही तो गुलशन महकाते

शनिवार, 25 मार्च 2017

"दूध-दही अपनाना है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


घर की वाटिकाओं में हमकोसब्जी-शाक उगाना है।
शोषण और कुपोषण सेखुद बचना और बचाना है।।

गैया-भैंसों का हमको लालन-पालन करना होगा
अण्डे-मांस छोड़करहमको दूध-दही अपनाना है। 
शोषण और कुपोषण सेखुद बचना और बचाना है।। 

छाछ और लस्सी कलियुग में अमृततुल्य कहाते हैं
पैप्सीकोका-कोला कोभारत से हमें भगाना है। 
शोषण और कुपोषण सेखुद बचना और बचाना है।। 

दाड़िम और अमरूद आदिफल जीवन देने वाले हैं
आँगन और बगीचों मेंफलवाले पेड़ लगाना है। 
शोषण और कुपोषण सेखुद बचना और बचाना है।। 

मानवता के हम संवाहकऋषियों के हम वंशज हैं
दुनिया भर को फिर सेशाकाहारी हमें बनाना है। 
शोषण और कुपोषण सेखुद बचना और बचाना है।।

शुक्रवार, 24 मार्च 2017

गीत "ढल गयी है उमर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

प्रीत की पोथियाँ बाँचते-बाँचते,
झुक गयी है कमर,
ढल गयी है उमर।
फासलों की फसल काटते-काटते,
झुक गयी है कमर,
ढल गयी है उमर।।

मन तो है चिरयुवा,
तन शिथिल पड़ रहा।
बूढ़ा बरगद अभी,
जंग को लड़ रहा।
सुख की सौगात को बाँटते-बाँटते,
झुक गयी है कमर।
ढल गयी है उमर।।

नेह की आस में,
बातियाँ जल रहीं।
वक्त आया बुरा,
आँधियाँ चल रहीं।
धुन्ध को-धूल को छाँटते-छाँटते,
झुक गयी है कमर,
ढल गयी है उमर।।

झूठ की रेल है,
सत्यता है कहाँ?
नौनिहालों में अब,
सभ्यता है कहाँ?
ज्ञान की गन्ध को बाँटते-बाँटते,
झुक गयी है कमर,
ढल गयी है उमर।।

देश आजाद है,
पर अमन हैं कहाँ?
मुस्कराता हुआ,
अब चमन हैं कहाँ?
ओस की बून्द को चाटते-चाटते,
झुक गयी है कमर,
ढल गयी है उमर।।

ख्वाब का नगमगी,
“रूप” है अब कहाँ?
प्यार की गुनगुनी,
धूप है अब कहाँ?
खाई अलगाव की पाटते-पाटते,
झुक गयी है कमर,
ढल गयी है उमर।।

गुरुवार, 23 मार्च 2017

ग़ज़ल "फूल बनकर सदा खिलखिलाते रहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दर्द की छाँव में मुस्कराते रहे
फूल बनकर सदा खिलखिलाते रहे

हमको राहे-वफा में ज़फाएँ मिली
ज़िन्दग़ी भर उन्हें आज़माते रहे

दिल्लगी थी हक़ीक़त में दिल की लगी
बर्क़ पर नाम उनका सजाते रहे

जब भी बोझिल हुई चश्म थी नींद से
ख़्वाब में वो सदा याद आते रहे

पास आते नहीं, दूर जाते नहीं
अपनी औकात हमको बताते रहे

हम तो ज़ालिम मुहब्बत के दस्तूर को
नेक-नीयत से पल-पल निभाते रहे

जब भी देखा सितारों को आकाश में
वो हसीं “रूप” अपना दिखाते रहे

बुधवार, 22 मार्च 2017

गीत "कल-कल, छल-छल करती धारा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जल में-थल में, नीलगगन में,
जो कर देता है उजियारा।
सबकी आँखों को भाता है,
रूप तुम्हारा प्यारा-प्यारा।।

कलियाँ चहक रही उपवन में,
गलियाँ महक रही मधुबन में,
कल-कल, छल-छल करती धारा।
सबकी आँखों को भाता है,
रूप तुम्हारा प्यारा-प्यारा।।

पंछी कलरव गान सुनाते,
मेढक टर्र-टर्र टर्राते,
खिला कमल, बनकर अंगारा।
सबकी आँखों को भाता है,
रूप तुम्हारा प्यारा-प्यारा।।

सूरज जन-जीवन को ढोता,
चन्दा शीतल-शीतल होता,
दोनो हरते हैं अंधियारा।
सबकी आँखों को भाता है,
रूप तुम्हारा प्यारा-प्यारा।।

कोई भूले अपने पथ को,
रौशन करते सदा जगत को,
तुमने सबका काज सँवारा।
सबकी आँखों को भाता है,
रूप तुम्हारा प्यारा-प्यारा।।

मंगलवार, 21 मार्च 2017

दोहे "बदलेंगे अब ढंग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दुनियाभर में छा गया, अपना भगवा रंग।
जीवन शैली के यहाँ, बदलेंगे अब ढंग।।
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आता जब अच्छा समय, होता सब अनुकूल।
खिलते जाते हैं पंक में, कमल-कुमुद के फूल।।
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अच्छे कामों में सदा, आते हैं अवरोध।
चूहें-छिपकलियाँ करें, रवि का बहुत विरोध।।
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सूरज रखता है नहीं, कभी किसी से बैर।
वसुन्धरा पर सभी की, सदा मनाता खैर।।
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करता देश समाज से, जो भी सच्चा प्यार।
नौका को पतवार से, कर देता वो पार।।
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रामचन्द्र के नाम पर, जिसने किया विवाद।
जन-मानस ने देश के, किया उसे बरबाद।।
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दीन दुखी को चाहिए, शासन में इंसाफ।
कूड़ा-करकट-गन्दगी, करो देश से साफ।।

सोमवार, 20 मार्च 2017

गीत "दिल तो है मतवाला गिरगिट" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
मोम कभी हो जाता है, तो पत्थर भी बन जाता है।
दिल तो है मतवाला गिरगिट, “रूप” बदलता जाता है।।

कभी किसी की नहीं मानता,
प्रतिबन्धों को नहीं जानता।
भरता है बिन पंख उड़ानें,
जगह-जगह की ख़ाक छानता।
वही काम करता है यह, जो इसके मन को भाता है।
दिल तो है मतवाला गिरगिट, “रूप” बदलता जाता है।।

अच्छे लगते अभिनव नाते,
करता प्रेम-प्रीत की बातें।
झोली होती कभी न खाली
सबके लिए भरी सौगातें।
तन को रखता सदा सुवासित, चंचल सुमन कहाता है।
दिल तो है मतवाला गिरगिट, “रूप” बदलता जाता है।।

पौध सींचता सम्बन्धों की,
रीत निभाता अनुबन्धों की।
मीठे पानी के सागर को,
नहीं जरूरत तटबन्धों की।
बाँध तोड़ देता है सारे, जब रसधार बहाता है।
दिल तो है मतवाला गिरगिट, “रूप” बदलता जाता है।। 

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