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शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

गीत "अपने मन को बहलाते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मधुमेह हुआ जबसे हमको,
मीठे से हम कतराते हैं।
गुझिया-बरफी के चित्र देख,
अपने मन को बहलाते हैं।।
1806mawa248
आलूचावल और रसगुल्ले,
खाने को मन ललचाता है,
हम जीभ फिराकर होठों पर,
आँखों को स्वाद चखाते हैं।
गुझिया-बरफी के चित्र देख,
अपने मन को बहलाते हैं।।
 Dal_Bhat_Tarkari,Nepal
गुड़ की डेली मुख में रखकर,
हम रोज रात को सोते थे,
बीते जीवन के वो लम्हें,
बचपन की याद दिलाते हैं।
गुझिया-बरफी के चित्र देख,
अपने मन को बहलाते हैं।।
 IMG_0887
हर सामग्री का जीवन में,
कोटा निर्धारित होता है,
उपभोग किया ज्यादा खाकर,
अब जीवन भर पछताते हैं।
गुझिया-बरफी के चित्र देख,
अपने मन को बहलाते हैं।।
थोड़ा-थोड़ा खाते रहते तो,
जीवन भर खा सकते थे,
पेड़ा और बालूशाही को,
हम देख-देख ललचाते हैं।
गुझिया-बरफी के चित्र देख,
अपने मन को बहलाते हैं।।
 
हमने खाया मन-तन भरके,
अब शिक्षा जग को देते हैं,
खाना मीठा पर कम खाना,
हम दुनिया को समझाते हैं।
गुझिया-बरफी के चित्र देख,
अपने मन को बहलाते हैं।।

गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

होली गीत "त्योहारों की रीत" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मन में आशायें लेकर के,
आया हैं मधुमास,
चलो होली खेलेंगे।
मूक-इशारों को लेकर के,
आया है विश्वास,
चलो होली खेलेंगे।।

मन-उपवन में सुन्दर-सुन्दरसुमन खिलें हैं,
रंग बसन्ती पहनेधरती-गगन मिले हैं,
बाग-बहारों को लेकर के,
छाया है उल्लास,
चलो होली खेलेंगे।

सरिता का सागर में,  ठौर-ठिकाना सा है,
प्रेम-प्रीत का मौसमबड़ा सुहाना सा है,
शोख नजारों को ले करके,
आया है दिन खास,
चलो होली खेलेंगे।

सपने जो देखे थेवो साकार करेंगे ,
बैर-भाव को भूल लोग अब प्यार करेंगे,
चाँद सितारों को ले करके,
आया है आकाश,
चलो होली खेलेंगे।

सुन्दर है संगीत, मिलन का गीत सुनाओ,
त्योहारों की रीत, गले से अब लग जाओ,
नेक विचारों को लेकर के,
जाओ सबके पास,
चलो होली खेलेंगे।

खुशियों की सौगात लिए,
होली आयी है,
चाँदी जैसी रात लिए,
होली आयी है,
सूर्य उजाला लेकर के,
लाया है धवल प्रकाश,
चलो होली खेलेंगे।


बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

गीत "चहक रहे हैं उपवन में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गदराई पेड़ों की डाली
हमें सुहाती हैं कानन में।।
हम पंछी हैं रंग-बिरंगे,
चहक रहे हैं वन-उपवन में।।

पवन बसन्ती जब पर्वत से,
चलकर मैदानों तक आती।
सुरभित फूलों की सुगन्ध तब,
मन में नव उल्लास जगाती।
अपनी खग भाषा में तब हम,
गीत सुनाते हैं मधुबन में।
हम पंछी हैं रंग-बिरंगे,
चहक रहे हैं वन-उपवन में।।

इन्द्र धनुष जब नभ में उगता,
प्यारा बहुत नजारा होता।
धरा-धाम के पाप-ताप को,
घन जब पावन जल से धोता।
जल की बून्दें बहुत सुहाती,
पड़ती हैं जब घर-आँगन में।
हम पंछी हैं रंग-बिरंगे,
चहक रहे हैं वन-उपवन में।।

उदय-अस्त की बेला में हम,
देते हैं सन्देश अनोखा।
गान उसी का करते हम.
जो रखता है लेखा-जोखा।
चलता जिसकी कृपादृष्टि से,
समयचक्र सबके जीवन में।
हम पंछी हैं रंग-बिरंगे,
चहक रहे हैं वन-उपवन में।।

सुख से रहना अगर चाहते,
सच से कभी न आँखें मींचो।
जीवन की सुन्दर बगिया को,
नियमित होकर प्रतिदिन सींचो।
नित्य नियम से रोज सवेरे,
सूरज उगता नील गगन में।
हम पंछी हैं रंग-बिरंगे,
चहक रहे हैं वन-उपवन में।।

मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018

दोहे "मुख्य नाम है ओम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

व्यापक हो संसार में, धरती हो या व्योम।
जगतनियन्ता आपका, मुख्य नाम है ओम।।

रोम-रोम में जो रमा, पुलकित करता रोम।
नाम भले ही भिन्न हों, कण-कण में है ओम।।

वेदों के जो मन्त्र हैं, उनसे करना होम।
लेकिन पहले सभी के, उच्चारण हो ओम।।

सारे दिन शुभ दिवस हैं, मंगल हों या सोम।
रूढ़िवाद को छोड़ कर, भजो नियम से ओम।।

निठुर नहीं बनना कभी, रखना मन को मोम।
कहता वैदिक धर्म है, सत्य सनातन ओम।।

सहजयोग में मुख्य है, नित अनुलोम-विलोम।
सुमिरण करना ध्यान से, ध्यान योग में ओम।।

गीत "सुधरा है परिवेश" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों!
पढ़िए मेरा यह मधुमास पर आधारित गीत।
फागुन की फागुनिया लेकरआया मधुमास!
पेड़ों पर कोपलियाँ लेकरआया मधुमास!!

धूल उड़ाती पछुआ चलतीजिउरा लेत हिलोर,
देख खेत में सरसों खिलतीनाचे मन का मोर,
फूलों में पंखुड़िया लेकरआया मधुमास!
पेड़ों पर कोपलियाँ लेकरआया मधुमास!!

निर्मल नभ है मन चञ्चल हैसुधरा है परिवेश,
माटी के कण-कण मेंअभिनव उभरा है सन्देश,
गीतों में लावणियाँ लेकरआया मधुमास!
पेड़ों पर कोपलियाँ लेकरआया मधुमास!!

छम-छम कानों में बजती हैं गोरी की पायलियाँ,
चहक उठी हैंमहक उठी हैंसारी सूनी गलियाँ,
होली की रागनियाँ लेकरआया मधुमास!
पेड़ों पर कोपलियाँ लेकरआया मधुमास!! 

सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

कविता "सेमल ने ऋतुराज सजाया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों! 
आज पढ़िए मेरी एक पुरानी रचना।
पाई है कुन्दन कुसुमों ने
कुमुद-कमलिनी जैसी काया।
आकर सबसे पहले
सेमल ने ऋतुराज सजाया।
महावृक्ष है सेमल का यह,
खिली हुई है डाली-डाली।
हरे-हरे फूलों के मुँह पर,
छाई है बसन्त की लाली।।
सर्दी के कारण जब तन में,
शीत-वात का रोग सताता।
सेमलडोढे की सब्जी से,
दर्द अंग का है मिट जाता।।
जब बसन्त पर यौवन आता,
तब ये खुल कर मुस्काते हैं।
भँवरे इनको देख-देखकर,
मन में हर्षित हो जाते हैं।।
सुमन लगे हैं अब मुर्झाने,
वासन्ती अवसान हो रहा।
तब इन पर फलियाँ-फल आये,
लम्बा दिन का मान हो रहा।।
गर्मी का मौसम आते ही,
चटक उठीं सेंमल की फलियाँ।
रूई उड़ने लगी गगन में,
 हुईँ रेशमी वन की गलियाँ।।

फूलो-फलो और मुस्काओ,
सीख यही देता है सेंमल।
तन से रहो सुडोल हमेशा,
किन्तु बनाओ मन को कोमल।।

रविवार, 18 फ़रवरी 2018

दोहे "सौतेला व्यवहार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

किया आपने था जिसे, मन से अंगीकार।
अब करते क्यों उसी से, सौतेला व्यवहार।१।

जिस चिट्ठे के साथ में, जुड़ा आपका नाम।
उस पर भी तो कीजिए, निष्ठा से कुछ काम।२।

लेखन के संसार में, चलना नहीं कुचाल।
जो सीधा-सीधा चले, होता वो खुशहाल।३।

सोच-समझ कर ही सदा, यहाँ बनाओ मित्र।
मन के मन्दिर में सदा, रक्खो उनके चित्र।४।

बिना नम्रता के सभी, होते दुष्कर काम।
अहमभाव से कभी भी, मिलता नहीं इनाम।५।

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