"सात रंगों से सजने लगी है धरा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
रूप कञ्चन कहीं है, कहीं है हरा।। पल्लवित हो रहा, पेड़-पौधों का तन, हँस रहा है चमन, गा रहा है सुमन, नूर ही नूर है, जंगलों में भरा। रूप कञ्चन कहीं है, कहीं है हरा।। देख मधुमास की यह बसन्ती छटा, शुक सुनाने लगे, अपना सुर चटपटा, पंछियों को मिला है सुखद आसरा। रूप कञ्चन कहीं है, कहीं है हरा।। देश-परिवेश सारा महकने लगा, टेसू अंगार बनकर दहकने लगा, सात रंगों से सजने लगी है धरा। रूप कञ्चन कहीं है, कहीं है हरा।। |



19 comments:
वाह ...बहुत ही अच्छी प्रस्तुति।
सतरंगी रचना...
सादर.
बसंतमयी सतरंगी रचना।
बहुत अच्छी प्रस्तुति,बेहतरीन सुंदर रचना,...
MY NEW POST ...कामयाबी...
सतरंगी रचना।सादर.
bahut sunder ...dhara ka aavran ,,,,
सुंदर वासंतिक भाव....
सुंदर रचना।
नये नये श्रंगार धारण करती प्रकृति..
indradhanush ke rango se saji rachna!
aadarniy sir
prakriti ke vividh rangon ko parilakxhit karti aapki post bahut bahut hi umda hai--------
sadar naman
poonam
प्रकृती का सुंदर चित्रण...
सुंदर रचना...:-)
वासंती रचना और प्रकृति का हास !
बहुत खुबसूरत रचना सर...
सादर.
Madhumas ka sundar chitran...
बहुत सुंदर रचना !!!
बहुत सुंदर! टेसू अंगार बनकर दहकने लगा,
मुझे टेसू बेहद पसंद है.बहुत नौराई लगती है उसकी यहाँ शहर में.
घुघूतीबासूती
सात रंगों से सजने लगी है धरा।
रूप कञ्चन कहीं है, कहीं है हरा।।
लो फिर बसंत आया...
वाह वाह वाह वाह...
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