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मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

"कुदरत ने सिंगार सजाया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


बौराई गेहूँ की काया,
फिर से अपने खेत में।
सरसों ने पीताम्बर पाया,
फिर से अपने खेत में।।

हरे-भरे हैं खेत-बाग-वन,
पौधों पर छाया है यौवन,
झड़बेरी ने "रूप" दिखाया,
फिर से अपने खेत में।।

नये पात पेड़ों पर आये,
टेसू ने भी फूल खिलाये,
भँवरा गुन-गुन करता आया,
फिर से अपने खेत में।।

धानी-धानी सजी धरा है,
माटी का कण-कण निखरा है,
मोहक रूप बसन्ती छाया,
फिर से अपने खेत में।।

पर्वत कितना अमल-धवल है,
गंगा की धारा निर्मल है,
कुदरत ने सिंगार सजाया,
फिर से अपने खेत में।।

21 टिप्‍पणियां:

  1. शास्त्री जी, कभी सोचता हूँ कि आप अपनी लेखनी कितने मस्त तरीके से अपने आस-पास के माहौल में ही रमाये रखते है ! हाँ, एक विनती है कि उपरोक्त कविता में " खेत में" की जगह "खेतों में" कर दें तो पठान में और आनंद आयेगा !

    उत्तर देंहटाएं
  2. शास्त्री जी, बहुत सुंदर प्रस्तुति बेहतरीन रचना,.....

    उत्तर देंहटाएं
  3. bahut sundar samayik rachna prakarti ki bhi apni chhata nirali hai.

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर सृजन ,
    सार्थक पोस्ट, आभार.
    मेरे ब्लॉग"meri kavitayen" की नवीनतम पोस्ट पर आप सादर आमंत्रित हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  5. मैं भी अपने लिये ऐसे ही स्थान पर खडे होने का स्वप्न देखता हूं... मधुर रचना...

    उत्तर देंहटाएं
  6. आप बिलकुल मेरे पिताजी की तरह लिखते हैं..
    सुन्दर सरल शब्दों का अद्भुत संयोजन..
    kalamdaan.blogspot.in

    उत्तर देंहटाएं
  7. गेहूं जामे गजल सा,
    सरसों जैसे छंद |
    जामे में सोहे भला,
    सूट ये कालर बंद ||

    उत्तर देंहटाएं
  8. वसंत ऋतु में प्रकृति की छटा निराली होती है आपकी कविता में प्रकृति का बहुत सुंदर चित्रण किया गया है. बधाई इस खूबसूरत पेशकश के लिये.

    उत्तर देंहटाएं
  9. वाह क्‍या बात है अपने खेत में।

    उत्तर देंहटाएं
  10. आदरणीय रविकर जी ने
    मेरे चित्र पर टिप्पणी की थी!
    रविकर Feb 21, 2012 04:16 AM
    गेहूं जामे गजल सा,
    सरसों जैसे छंद |
    जामे में सोहे भला,
    सूट ये कालर बंद ||
    प्रत्‍युत्तर दें
    “उत्तर”
    रविकर Feb 21, 2012 04:19 AM
    सुटवा कालर बंद ||
    उसी के उत्तर में पाँच दोहे
    आदरणीय “रविकर” जी को
    समर्पित कर रहा हूँ!

    रविकर जी को भा रहा, अब भी मेरा रूप।
    वृद्धावस्था में कहाँ, यौवन जैसी धूप।।

    गेहूँ उगता ग़ज़ल सा, सरसों करे किलोल।
    बन्द गले के सूट में, ढकी ढोल की पोल।।

    मौसम आकर्षित करे, हमको अपनी ओर।
    कनकइया डग-मग करे, होकर भावविभोर।।

    कड़क नहीं माँझा रहा, नाज़ुक सी है डोर।
    पतंग उड़ाने को चले, बिन बाँधे ही छोर।।

    पत्रक जब पीला हुआ, हरियाली नहीं पाय।
    ना जाने कब डाल से, पका पान झड़ जाय।।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. दिनेश की टिप्पणी - आपका लिंक
      http://dineshkidillagi.blogspot.in/2012/02/links.html

      हटाएं
    2. माता होय कुरूप अति, होंय पिता भी अंध |
      वन्दनीय ये सर्वदा, अतिशय पावन बंध ||
      बंध = शरीर

      उच्चारण अतिशय भला, रहे सदा आवाज |
      शब्द छीजते हैं नहीं, पञ्च-तत्व कर लाज ||

      देव आज देते चले, फिर से पैतिस साल |
      स्वस्थ रहेंगे सर्वदा, नौनिहाल सौ पाल ||

      हटाएं
  11. यौवन जैसा रूप तो, नही वृद्धावस्था का मोहताज़
    आप गुनो की ख़ान हैं खोल रहे हम राज

    उत्तर देंहटाएं
  12. चाचा जी का रूप हैं जैसे सुन्दर प्यारा मोर
    बंद गले का कोट क्या..जचे इन पे सब कोय

    उत्तर देंहटाएं

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