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सोमवार, 23 जुलाई 2012

"धरती आज तरसती है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

   
नदिया-नाले सूख रहे हैं, जलचर प्यासे-प्यासे हैं।
पौधे-पेड़ बिना पानी के, व्याकुल खड़े उदासे हैं।।

चौमासे के मौसम में, सूरज से आग बरसती है।
जल की बून्दें पा जाने को, धरती आज तरसती है।।

नभ की ओर उठा कर मुण्डी, मेंढक चिल्लाते हैं।
बरसो मेघ धड़ाके से, ये कातर स्वर में गाते हैं।।

दीन-कृषक है दुखी हुआ, बादल की आँख-मिचौली से।
पानी अब तक गिरा नही, क्यों आसमान की झोली से?

तितली पानी की चाहत में दर-दर घूम रही है।
फड़-फड़ करती तुलसी की ठूँठों को चूम रही है।।

दया करो घनश्याम, सुधा सा अब तो जम करके बरसो।
रिमझिम झड़ी लगा जाओ, अब क्यों करते कल-परसों?

23 टिप्‍पणियां:

  1. बरसो रे मेघा मेघा
    बरसो रे मेघा बरसो ..

    बहुत सुंदर आग्रह बादलों से ..
    सादर !

    उत्तर देंहटाएं
  2. नदिया-नाले सूख रहे हैं, जलचर प्यासे-प्यासे हैं।
    पौधे-पेड़ बिना पानी के, व्याकुल खड़े उदासे हैं।।
    समयानुकूल वेदना पूर्ण आग्रह -सुन्दर, मनोहर -बरसों राम धडाके से भ्रष्ट मारें सब फाके से,डूबें गंदे नालें में .

    उत्तर देंहटाएं
  3. समयानुकूल वेदना पूर्ण आग्रह -सुन्दर, मनोहर -बरसों राम धडाके से भ्रष्ट मारें सब फाके से,डूबें गंदे नालें में . कृपया यहाँ भी दस्तक देवें -
    ram ram bhai
    सोमवार, 23 जुलाई 2012
    कैसे बचा जाए मधुमेह में नर्व डेमेज से

    कैसे बचा जाए मधुमेह में नर्व डेमेज से

    http://veerubhai1947.blogspot.de/

    उत्तर देंहटाएं
  4. Shastri Sir....कई द्रवित , पीड़ित लोगों की आवाज़ सुनाई दे रही है आपकी इस कविता में !
    सादर !!!

    उत्तर देंहटाएं
  5. दया करो घनश्याम, सुधा सा अब तो जम करके बरसो।
    रिमझिम झड़ी लगा जाओ, अब क्यों करते कल-परसों?

    जन जन की आवाज ही नही समस्त जड़ चेतन
    की पीड़ा का अनुभव हो रहा है आपकी मार्मिक
    प्रस्तुति में.

    आभार,शास्त्री जी.

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर, अर्थपूर्ण पंक्तियाँ ....

    उत्तर देंहटाएं
  7. दीन-कृषक है दुखी हुआ, बादल की आँख-मिचौली से।
    पानी अब तक गिरा नही, क्यों आसमान की झोली से?

    intezar hai.

    उत्तर देंहटाएं
  8. बरसो मेघ, तरसते बीज, आँख खुलना चाहें...

    उत्तर देंहटाएं
  9. सुंदर आग्रह ..खुबसूरत प्रस्तुति...

    उत्तर देंहटाएं
  10. दया करो घनश्याम, सुधा सा अब तो जम करके बरसो।
    रिमझिम झड़ी लगा जाओ, अब क्यों करते कल-परसों?

    ham bhi is prarthna me shamil hain.

    उत्तर देंहटाएं
  11. सूखे के आसार हैं, बही नहीं जलधार ।

    हैं अषाढ़ सावन गए, कर भादौं उपकार ।।

    उत्तर देंहटाएं
  12. वाह ... बहुत खूब।

    कल 25/07/2012 को आपकी इस पोस्‍ट को नयी पुरानी हलचल पर लिंक किया जा रहा हैं.

    आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!


    '' हमें आप पर गर्व है कैप्टेन लक्ष्मी सहगल ''

    उत्तर देंहटाएं
  13. मनुष्य, जीव-जंतु, खेत-खलिहान सभी प्यासे हैं, इस भावपूर्ण गीत को सुनकर अब तो मेघ बरसेगा ही. सुन्दर रचना, बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  14. दीन-कृषक है दुखी हुआ, बादल की आँख-मिचौली से।
    पानी अब तक गिरा नही, क्यों आसमान की झोली से?

    बहुत बढिया प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  15. दया करो घनश्याम, सुधा सा अब तो जम करके बरसो।
    रिमझिम झड़ी लगा जाओ, अब क्यों करते कल-परसों?

    बहुत सुंदर !
    घन श्याम अब तो आ जाओ
    सूखा आसमान ही नहीं है
    सब जगह नजर आ रहा है
    आदमी पानी के अलावा
    बहुत सी और जगह पर भी
    प्यासा रह जा रहा है !

    उत्तर देंहटाएं
  16. बहुत सुन्दर सार्थक सन्देश परक पंक्तियाँ हर चीज कि महत्ता समय के अनुसार होती है फसलों को इस वक़्त पानी कि जरूरत है और मेघ राजा हैं कि सुनते ही नहीं

    उत्तर देंहटाएं
  17. "दीन-कृषक है दुखी हुआ, बादल की आँख-मिचौली से।
    पानी अब तक गिरा नही, क्यों आसमान की झोली से?"

    अर्थ पूर्ण वर्जना.. अति सुंदर..

    उत्तर देंहटाएं

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