"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

शनिवार, 29 जून 2013

"चापलूस बैंगन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बैंगन का करना नहीं, कोई भी विश्वास।
माल-ताल जिस थाल में, जाते उसके पास।।
 --
कुछ बैंगन होते यहाँ, चतुर और चालाक।
छल से और फरेब से, खूब जमाते धाक।।
 
जब चुन कर के आये थे, तब थे बहुत कुरूप।
जब से कुर्सी मिल गयी, निखर गया है रूप।।
-- 
मनमोहन को मोहते, ऐसे ही चितचोर।
चापलूस बैंगन सदा, करते भाव विभोर।।
 
कल तक जो कंगाल थे, अब हैं माला-माल।
इनका घर भरता सदा, सूखा-बाढ़-अकाल।।
--
घोटालों के वास्ते, बनते हैं आयोग।
फलते इनके नाम पे, बैंगन के उद्योग।।
दाम-दण्ड औभेद से, लेते हैं ये काम।
छल की है इनकी तुला, कारा में है साम।।

12 टिप्‍पणियां:

  1. ऊपर से दिखती है बात तरकारी की
    भीतर मगर कुछ और ही सवाल है।
    आपका अंदाजे बयां है ग़ज़ब मयंक जी
    पाठक यह अदना - सा हो गया निहल है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. सच है कवि साहित्यकार ही आने वाले स्वर्णिम युग की नींव रखेंगे ... धूर्तों के विरोध में वातावरण निरंतर बनाए रखना है।

    चापलूस प्रमुख (मुखिया) के चारों ओर चापलूसों के जमावड़े ने देश की छवि को धूमिल किया ही है। मुखिया जी भारत देश के प्रतिनिधि कम पूंजीवादी देशों के एजेंट अधिक नज़र आते हैं।



    अब वे बिना बालों (बिना जूड़ी) वाले सरदार हैं। आत्मा विहीन शरीर, स्वाभिमान शून्य ह्रदय हैं।


    घोटालों के मल-विष्ठा वाले नाले में तैरते निचुड़े नीम्बू के छिलके हैं। इतने घृणास्पद कि जिन्हें देखकर स्वतः कय हो जाए। इतने धिक्कार के योग्य कि थूक-थूककर भी थकान महसूस न हो।

    मयंक जी, आपकी इस रचना से तब तक सुख मिलेगा जब तक सार्थक बदलाव न आये। आपका बैंगनी रूपक पसंद आया। आभार इन भावों को व्यक्त करने के लिए।

    उत्तर देंहटाएं
  3. यह सही रहा ..
    मंगलकामनाएं आपको !

    उत्तर देंहटाएं
  4. भारत की कहानी बैंगन की जुबानी भैया बैंगन राखिये ,बैंगन बिन सब सून ....

    उत्तर देंहटाएं
  5. अच्छा तुल्नात्मक व्यंग और ठोस प्रहार..
    शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  6. बैगन के सहारे सबको निपटाया है आपने, बहुत सुन्दर।

    उत्तर देंहटाएं
  7. बढ़िया है यह कविता भी
    सादर-


    थाली का बैगन नहीं , बैंगन की ही थाल |
    जो बैंगन सा बन रहा, गली उसी की दाल ||

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुती, ठोस प्रहार,आभार ।

    उत्तर देंहटाएं
  9. सुन्दर और सार्थक प्रस्तुती, आभार

    उत्तर देंहटाएं
  10. यह बैगन गाथा बढिया रही पर ये सफ़ेद बैंगन कहां से ले आये?:)

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  11. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।। त्वरित टिप्पणियों का ब्लॉग ॥

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails