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गुरुवार, 29 अगस्त 2013

"इल्म रहता पायदानों में" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

छलक जाते हैं अब आँसू, ग़ज़ल को गुनगुनाने में।
नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।।

नदी-तालाब खुद प्यासे, चमन में घुट रही साँसें,
प्रभू के नाम पर योगी, लगे खाने-कमाने में।

हुए बेडौल तन, चादर सिमट कर हो गई छोटी,
शजर मशगूल हैं अपने फलों को आज खाने में।

दरकते जा रहे अब तो, हमारी नींव के पत्थर,
चिरागों ने लगाई आग, खुद ही आशियाने में।

लगे हैं पुण्य पर पहरे, दया के बन्द दरवाजे,
दुआएँ कैद हैं अब तो, गुनाहों की दुकानों में।

जिधर देखो उधर ही “रूप” का, सामान बिकता है,
रईसों के यहाँ अब, इल्म रहता पायदानों में।

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - शुक्रवार 30/08/2013 को
    हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः9 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुन्दर प्रस्तुति-
    शुभकामनायें-

    उत्तर देंहटाएं
  3. बड़ी ही सुन्दर रचना है। हर एक बात सत्य है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बेहतरीन अंदाज़..... सुन्दर
    अभिव्यक्ति......

    उत्तर देंहटाएं
  5. लगे हैं पुण्य पर पहरे, दया के बन्द दरवाजे,
    दुआएँ कैद हैं अब तो, गुनाहों की दुकानों में।

    सही कहा है आपने

    उत्तर देंहटाएं
  6. जिधर देखो उधर ही “रूप” का, सामान बिकता है,
    रईसों के यहाँ अब, इल्म रहता पायदानों में।

    भाव का सागर है पूरी गजल। व्यंग्य पीड़ा लिए है।

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत बढ़िया रचना...

    सादर
    अनु

    उत्तर देंहटाएं

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