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शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

"दोहे-अन्धा कानून" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

खौफ नहीं कानून का, इन्सानों को आज।
हैवानों की होड़ अब, करने लगा समाज।।
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लोकतन्त्र में न्याय से, होती अक्सर भूल।
कौआ मोती निगलता, हंस फाँकता धूल।।
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धनबल-तनबल-राजबल, जन-गण रहे पछाड़।
बच जाते मक्कार भी, लेकर शक की आड़।।
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मोटी रकम डकार कर, करते बहस वकील।
गद्दारों के पक्ष में, देते तर्क दलील।।
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सरे आम होने लगा, नारी का अपमान।
पोथी-पत्री में निहित, अबला का सम्मान।।
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नर-नारी की खान को, अबला रहे पुकार।
बेटों को तो लाड़ हैं, बेटी को दुत्कार।।
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माँ-बहनों के रूप की, लगती बोली आज।
अन्धा ही कानून है, अन्धा ही है राज।।

6 टिप्‍पणियां:

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