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गुरुवार, 26 जून 2014

"दस दोहे-अन्तरजाल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


मन में तो है कलुषता, होठों पर हरि नाम।
काम-काम को छल रहा, अब तो आठों याम।।
--
लटक रहे हैं कब्र में, जिनके आधे पाँव।
वो ही ज्यादा फेंकते, इश्क-मुश्क के दाँव।।
--
मन की बात न मानिए, मन है सदा जवान।
तन की हालत देखिए, जिसमें भरी थकान।।
--
नख-शिख को मत देखिए, होगा हिया अशान्त।
भोगवाद को त्याग कर, रक्खो मन को शान्त।।
--
रोज फेसबुक पर लिखो, अपने नवल विचार।
अच्छी सूरत देख कर, मत फैलाओ विकार।।
--
सीख बड़ों से ज्ञान को, छोटों को दो ज्ञान।
जीवन ढलती शाम है, दिन का है अवसान।।
--
अनुभव अपने बाँटिए, सुधरेगा परिवेश।
नवयुग को अब दीजिए, जीवन का सन्देश।।
--
भरा हुआ है सिन्धु में, सभी तरह का माल।
जो भी जिसको चाहिए, देगा अन्तरजाल।।
--
महादेव बन जाइए, करके विष का पान।
धरा और आकाश में, देंगे सब सम्मान।।

5 टिप्‍पणियां:

  1. रोज फेसबुक पर लिखो, अपने नवल विचार।
    अच्छी सूरत देख कर, मत फैलाओ विकार।।12||
    सटीक दोहे-
    आभार आदरणीय-

    उत्तर देंहटाएं
  2. --
    भरा हुआ है सिन्धु में, सभी तरह का माल।
    जो भी जिसको चाहिए, देगा अन्तरजाल।।
    महिमा अपार जाल -अंतर की।

    उत्तर देंहटाएं
  3. अंतरजाल की महिमा अपरम्पार है...

    उत्तर देंहटाएं

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