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शुक्रवार, 17 मार्च 2017

दोहे "काम न करना बन्द" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

लेखन से बढ़ कर नहीं, कोई भी आनन्द।
नियमित लेखन का कभी, काम न करना बन्द।।
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जो लिखते हैं नियम से, मन के सब अनुभाव।
उनके मन में भाव का, होता नहीं अभाव।।
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मानव ही तो जगत में, करता प्रकट विचार।
भगवन ने इंसान में, ताकत भरी अपार।।
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बहता पानी ही करे, कल-कल शब्द निनाद।
कामों से ही व्यक्ति को, रक्खा जाता याद।।
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दौलत के मद में कभी, होना मत मग़रूर।
खुद को वाद-विवाद से, रखना हरदम दूर।।
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चाहे कितने खाइए, ताकत के अवलेह।
अमर नहीं रहती कभी, मिट्टी की यह देह।।
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लेखन-पाठन का करो, सच्चे मन से काम।
दुनिया में होगा सदा, अमर आपका नाम।।

3 टिप्‍पणियां:

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