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गुरुवार, 2 मार्च 2017

गीत "आया नया निखार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बौरायें हैं सारे तरुवरपहन सुमन के हार।
मोह रहा है सबके मन को बासन्ती शृंगार।।

गदराई है डाली-डाली,
चारों ओर सजी हरियाली,
कुहुक रही है कोयल काली
नीम-बेर-बेलों पर भी आया है नया निखार।
मोह रहा है सबके मन को बासन्ती शृंगार।।

हँसते गेहूँसरसों खिलती
तितली भी फूलों से मिलती,
पवन बसन्ती सर-सर चलती
सबको गले मिलाने आयाहोली का त्यौहार।
मोह रहा है सबके मन को बासन्ती शृंगार।।

निर्मल जल की धारा बहती,
कभी न थकती चलती रहती,
नदिया तालाबों से कहती,
"चरैवेति" पर टिका हुआ है सारा ही संसार।
मोह रहा है सबके मन को बासन्ती शृंगार।।

1 टिप्पणी:

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