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शनिवार, 11 मार्च 2017

दिन आ गये हैं प्यार के "सरस्वती माता का कोटि-कोटि अभिनन्दन"


नहीं जानता कैसे बन जाते हैं,
मुझसे गीत-गजल।
जाने कब मन के नभ पर,
छा जाते हैं गहरे बादल।।

ना कोई कॉपी ना कागज,
ना ही कलम चलाता हूँ।
खोल पेज-मेकर को,
हिन्दी टंकण करता जाता हूँ।।

देख छटा बारिश की,
अंगुलियाँ चलने लगतीं है।
कम्प्यूटर देखा तो उस पर,
शब्द उगलने लगतीं हैं।।

नजर पड़ी टीवी पर तो,
अपनी हरकत कर जातीं हैं।
चिड़िया का स्वर सुन कर,
अपने करतब को दिखलातीं है।।

बस्ता और पेंसिल पर,
उल्लू बन क्या-क्या रचतीं हैं।
सेल-फोन, तितली-रानी,
इनके नयनों में सजतीं है।।

कौआ, भँवरा और पतंग भी,
इनको बहुत सुहाती हैं।
नेता जी की टोपी,
श्यामल गैया बहुत लुभाती है।।

सावन का झूला हो,
चाहे होली की हों मस्त फुहारें।
जाने कैसे दिखलातीं ये,
बाल-गीत के मस्त नजारे।।

मैं तो केवल जाल-जगत पर,
इन्हें लगाता जाता हूँ।
क्या कुछ लिख मारा है,
मुड़कर नही देख ये पाता हूँ।।

जिन देवी की कृपा हुई है,
उनका करता हूँ वन्दन।
सरस्वती माता का करता,
कोटि-कोटि हूँ अभिनन्दन।।

खिल उठा सारा चमन, दिन आ गये हैं प्यार के।
रीझने के खीझने के, प्रीत और मनुहार के।। 

चहुँओर धरती सज रही और डालियाँ हैं फूलती,
पायल छमाछम बज रहीं और बालियाँ हैं झूलती,
डोलियाँ सजने लगीं, दिन आ गये शृंगार के।
रीझने के खीझने के, प्रीत और मनुहार के।।

झूमते हैं मन-सुमन, गुञ्जार भँवरे कर रहे,
टेसुओं के फूल, वन में रंग अनुपम भर रहे,
गान कोयल गा रही, दिन आ गये अभिसार के।
रीझने के खीझने के, प्रीत और मनुहार के।।


कचनार की कच्ची कली भी, मस्त हो बल खा रही,
हँस रही सरसों निरन्तर, झूमकर कर इठला रही,
बज उठी वीणा मधुर सुर सज गये झंकार के।
रीझने के खीझने के, प्रीत और मनुहार के।।
 

5 टिप्‍पणियां:

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