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बुधवार, 26 अप्रैल 2017

दोहे "मेहनत की पतवार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

खाली कभी न बैठिए, करते रहिए काम।
लिखने-पढ़ने से सदा, होगा जग में नाम।।
--
खाली रहे दिमाग तो, मन में चढ़े फितूर।
खुराफात इंसान को, कर देती मग़रूर।।
--
करे किनारा सुजन जब, मिट जाते सम्बन्ध।
दुनियादारी में धरे, रह जाते अनुबन्ध।।
--
नहीं कभी अभिमान से, बनती कोई बात।
ज्ञानी-सन्त-महन्त की, मिट जाती औकात।।
--
धन-दौलत-सौन्दर्य पर, मत करना अभिमान।
सेवा करके गुरू की, माँग लीजिए ज्ञान।।
--
गुरू चाहता शिष्य से, इतना ही प्रतिदान।
जीवनभर करता रहे, चेला उसका सम्मान।।
--
मन में रहे उदारता, आदर के हों भाव।
मेहनत की पतवार से, पार लगेगी नाव।।
  

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

"ग़ज़ल हो गयी क्या" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

ज़ज़्बात के बिन, ग़ज़ल हो गयी क्या
बिना दिल के पिघले, ग़ज़ल हो गयी क्या

नहीं कोई मक़सद, नहीं सिलसिला है
बिना बात के ही, ग़ज़ल हो गयी क्या

नहीं कोई कासिद, नहीं कोई चिठिया
बिना कुछ लिखे ही, ग़ज़ल हो गयी क्या

जरूरत के पाबन्द हैं, लोग अब तो
बिना दिल मिले ही, ग़ज़ल हो गयी क्या

नज़र वो नहीं है, नज़ारे नहीं हैं
तन्हाइयों में, ग़ज़ल हो गयी क्या

नहीं कोई माशूक, आशिक नहीं है
तआरुफ़ बिना ही, ग़ज़ल हो गयी क्या

हुनर की जरूरत, न सीरत से मतलब
महज रूप से ही, ग़ज़ल हो गयी क्या 

गीत "अमलतास के झूमर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अमलतास के पीले गजरेझूमर से लहराते हैं।
लू के गर्म थपेड़े खाकर भी, हँसते-मुस्काते हैं।।

ये मौसम की मार, हमेशा खुश हो कर सहते हैं,
दोपहरी में क्लान्त पथिक को, छाया देते रहते हैं,
सूरज की भट्टी में तपकर, कंचन से हो जाते हैं।
लू के गर्म थपेड़े खाकर भी, हँसते-मुस्काते हैं।।

उछल-कूद करते मस्ती में, गिरगिट और गिलहरी भी,
वासन्ती आभास कराती, गरमी की दोपहरी भी,
प्यारे-प्यारे सुमन प्यार से, आपस में बतियाते हैं।
लू के गर्म थपेड़े खाकर भी, हँसते-मुस्काते हैं।।

लुभा रहे सबके मन को, जो आभूषण तुमने पहने,
अमलतास तुम धन्य, तुम्हें कुदरत ने बख्शे हैं गहने,
सड़क किनारे खड़े तपस्वी, अभिनव “रूप” दिखाते हैं।
लू के गर्म थपेड़े खाकर भी, हँसते-मुस्काते हैं।।

रविवार, 23 अप्रैल 2017

दोहे "बत्ती नीली-लाल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नहीं मिलेगी किसी को, बत्ती नीली-लाल।
अफसरशाही को हुआ, इसका बहुत मलाल।।
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लाल बत्तियों पर लगी, अब भगवा की रोक।।
सत्ता भोग-विलास में, छाया भारी शोक।।
--
लालबत्तियाँ पूछतीं, शासन से ये राज़।
इतने दशकों बाद क्यों, गिरी अचानक ग़ाज़।।
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नेताओं का पड़ गया, चेहरा आज सफेद।
पलक झपकते मिट गया, आम-खास का भेद।।
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देखे कब तक चलेगा, यह शाही फरमान।
दशकों की जागीर का, लुटा आज अभिमान।।
--
समय-समय की बात है, समय-समय का फेर।
नहीं मिलेगी भोज में, तीतर और बटेर।।
--
अच्छा है यह फैसला, भले हुई हो देर।
एक घाट पर पियेंगे, पानी, बकरी-शेर।।
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भारी मन से हो रहा, निर्णय यह स्वीकार।
सजी-धजी इस कार का, उजड़ गया सिंगार।।

दोहे "पुस्तक-दिन हो सार्थक, ऐसा करो उपाय" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

पढ़े-लिखे करते नहीं, पुस्+तक से सम्वाद।
इसीलिए पुस्+तक-दिवस, नहीं किसी को याद।।
--
पुस्+तक उपयोगी नहीं, बस्ते का है भार।
बच्चों को कैसे भला, होगा इनसे प्यार।।
--
अभिरुचियाँ समझे बिना, पौध रहे हैं रोप।
नन्हे मन पर शान से, देते कुण्ठा थोप।।
--
बालक की रुचियाँ समझ, देते नहीं सुझाव।
बेमतलब की पुस्+तकें, भर देंगी उलझाव।।
--
शिक्षामन्त्री हो जहाँ, शिक्षा से भी न्यून।
कैसे हों लागू वहाँ, हितकारी कानून।।
--
पाठक-पुस् तक में हमें, करना होगा न्याय।
पुस्+तक-दिन हो सार्थक, ऐसा करो उपाय।।

कुण्डलियाँ "कम्प्यूटर और जालजगत" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कम्प्यूटर और इण्टरनेट 
(चार कुण्डलियाँ)
(१)
जालजगत है देवताकम्प्यूटर भगवान।
शोभा है यह मेज कीऑफिस की है शान।।
ऑफिस की है शानबनाता अनुबन्धों को।
सारे जग में सदाबढ़ाता सम्बन्धों को।।
कह मयंक कविरायअनागत ही आगत है।
सबसे ज्ञानी अब दुनिया में जालजगत है।।

(२)
कम्प्यूटर अब बन गयाजीवन का आधार।
इसके बिन चलता नहीचिट्ठों का व्यापार।।
चिट्ठों का व्यापारलेख-रचना का आँगन।
चिट्ठी-पत्रीबातचीत का, है यह साधन।।
कह मयंक कविराययही है उन्नत ट्यूटर।
खाता-बही हटायलगाओ अब कम्प्यूटर।।
(३)
चिट्ठाकारी को लगाबेनामी का रोग।
टिप्पणियों को दानकरदेते मोहन भोग।।
देते मोहन भोगसृजन का लक्ष यही है। 

सन्देशों में अपनेपन का, पक्ष नहीं है।। 
कह मयंक हथियार बिना है मारामारी।
टिपियाने का नामआज है चिट्ठाकारी।।

(४)
झूठी सुन तारीफ कोमन ही मन हर्षाय।
जब सुनते आलोचनाहृदय कुन्द हो जाए।।
हृदय कुन्द हो जायविरोधी बन जाते हैं।
खुदगर्जीँ में सच कोसहन न कर पाते हैं।।
मुखपोथी(FACEBOOK) की दुनिया, होती बहुत अनूठी।
हर्षित होते लोगप्रशंसा सुन कर झूठी।।

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

दोहे "धरती का त्यौहार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

एक साल में एक दिन, धरती का त्यौहार।
धरा दिवस का सपन फिर, होगा फिर साकार।१।
--
कंकरीट जबसे बना,  जीवन का आधार।
धरती की तब से हुई, बड़ी करारी हार।२।
--
पेड़ कट गये धरा के, बंजर हुई जमीन।
प्राणवायु घटने लगी, छाया हुई विलीन।३।
--
नैसर्गिक अनुभाव का, होने लगा अभाव।
दुनिया में होने लगे, मौसस में बदलाव।४।
--
शस्य-श्यामला धरा को, किया प्रदूषित आज।
कुदरत से खिलवाड़ अब, करने लगा समाज।५।
--
नकली सुमनों में नहीं, होता है मकरन्द।
कृत्रिमता में खोजता, मनुज आज आनन्द।६।
--
जहर बेचकर लोग अब, लगे बढ़ाने कोष।
औरों के सिर मढ़ रहे, अपने सारे दोष।७।
--
ओछे कर्मों से हुए, हम कितने मजबूर।
आज मजे से दूर हैं, कृषक और मजदूर।८।
--
जबसे जंगल में बिछा, कंकरीट का जाल।
धरती पर आने लगे, चक्रवात-भूचाल।९।
--
अब तो मुझे बचाइए, धरती कहे पुकार।
पेड़ लगाकर कीजिए, धरती का शृंगार।१०।

"अपना धर्म निभाओगे कब" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


अपना धर्म निभाओगे कब
जग को राह दिखाओगे कब

अभिनव कोई गीत बनाओ,
घूम-घूमकर उसे सुनाओ
स्नेह-सुधा की धार बहाओ
वसुधा को सरसाओगे कब
जग को राह दिखाओगे कब

सुस्ती-आलस दूर भगा दो
देशप्रेम की अलख जगा दो
श्रम करने की ललक लगा दो
नवअंकुर उपजाओगे कब
जग को राह दिखाओगे कब

देवताओं के परिवारों से
ऊबड़-खाबड़ गलियारों से
पर्वत के शीतल धारों से
नूतन गंगा लाओगे कब
जग को राह दिखाओगे कब

सही दिशा दुनिया को देना
अपनी कलम न रुकने देना
भाल न अपना झुकने देना
सच्चे कवि कहलाओगे तब
जग को राह दिखाओगे तब

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

गीत "सूरज अनल बरसा रहा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

हो गया मौसम गरम,
सूरज अनल बरसा रहा।
गुलमोहर के पादपों का,
रूप सबको भा रहा।।

दर्द-औ-ग़म अपना छुपा,
हँसते रहो हर हाल में,
धैर्य मत खोना कभी,
विपरीत काल-कराल में,
चहकता कोमल सुमन,
सन्देश देता जा रहा।
गुलमोहर के पादपों का,
रूप सबको भा रहा।।

घूमता है चक्र, दुख के बाद,
 सुख भी आयेगा,
कुछ दिनों के बाद बादल,
नेह भी बरसायेगा,
ग्रीष्म ही तरबूज, ककड़ी
और खीरे ला रहा।
गुलमोहर के पादपों का,
रूप सबको भा रहा।।

सर्दियों के बाद तरु,
पत्ते पुराने छोड़ता,
गर्मियों के वास्ते,
नवपल्लवों को ओढ़ता,
पथिक को छाया मिले,
छप्पर अनोखा छा रहा।
 गुलमोहर के पादपों का,
रूप सबको भा रहा।।

गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

दोहे "बातों का अनुपात" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


सभी तरह की निकलती, बातों में से बात।
बातें देतीं हैं बता, इंसानी औकात।।
--
माप नहीं सकते कभी, बातों का अनुपात।
रोके से रुकती नहीं, जब चलती हैं बात।।
--
जनसेवक हैं बाँटते, बातों में खैरात।
अच्छी लगती सभी को, चिकनी-चुपड़ी बात।।
--
नुक्कड़-नुक्कड़ पर जुड़ी, छोटी-बड़ी जमात।
ठलवे करते हैं जहाँ, बेमतलब की बात।।
--
बद से बदतर हो रहे, दुनिया के हालात।
लेकिन मुद्दों पर नहीं, होती कोई बात।।
--
बादल नभ पर छा गये, दिन लगता है रात।
गरमी में बरसात की, लोग कर रहे बात।।
--
कूड़े-करकट से भरे, नगर और देहात।
मगर दिखावे के लिए, होती सुथरी बात।।
--
भूल गये हैं लोग अब, कॉपी-कलम-दवात।
करते हैं सब आजकल, कम्प्यूटर की बात।।
--
जीवन के पर्याय हैं, झगड़े-झंझावात।
बैठ आमने-सामने, सुलझाओ सब बात।।
--
बातों से मिलती नहीं, हमको कभी निजात।
कहिए मन की बात अब, बातों में है बात।।

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

गीत "मैदान बदलते देखे हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

इंसानों की बोली में, ईमान बदलते देखे हैं।
धनवानों की झोली में, सामान बदलते देखे हैं।।

सौंपे थे हथियार युद्ध में, अरि को सबक सिखाने को,
उनका ही मुँह मोड़ दिया, अपनों को घाव खिलाने को,
गद्दारों की गोली में, संधान बदलते देखे हैं।
धनवानों की झोली में, सामान बदलते देखे हैं।।

भारी पाला दिखा जिधर, उस ओर अचानक जा फिसले,
माना था जिनको अपना, वो थाली के बैंगन निकले,
मक्कारों की टोली में, मैदान बदलते देखे हैं।
धनवानों की झोली में, सामान बदलते देखे हैं।।

किस पर करें भरोसा, अब कोई भी धर्म-इमान नहीं,
अपने और पराये की, दुनिया में कुछ पहचान नहीं,
अरमानों की डोली में, मेहमान बदलते देखे हैं।
धनवानों की झोली में, सामान बदलते देखे हैं।।

जीवन की आपाधापी में, झंझावात बहुत फैले हैं,
उजले-उजले तन वालों के, अन्तस तो मैले-मैले हैं,
रंगों की रंगोली में, परिधान बदलते देखे हैं।
धनवानों की झोली में, सामान बदलते देखे हैं।।

साग-दाल को छोड़, अमानुष भोजन को अपनाया है,
लुप्त हो गयी सत्य अहिंसा, हिंसा का युग आया है,
नादानों की होली में, अनुपान बदलते देखे हैं।
धनवानों की झोली में, सामान बदलते देखे हैं।।

बाहुबली हैं सत्ताधारी, हरिश्चन्द्र लाचार हुए,
लोकतन्त्र के दरवाजे पर, पढे-लिखे बेकार हुए,
बलवानों की खोली में, दरबान बदलते देखे हैं।
धनवानों की झोली में, सामान बदलते देखे हैं।

मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

दोहे "दाढ़ी में है चोर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

पग-पग पर है घेरती, सौतन जिसको आज।
उस भाषा के जाल में, जकड़ा हुआ समाज।।
--
कविता हिन्दी की मगर, अँगरेजी का जोर।
छिपा हुआ बैठा अभी, दाढ़ी में है चोर।।
--
अँगरेजी का दिलों पर, छाया हुआ बुखार।
कदम-कदम पर हो रही, हिन्दी की ही हार।।
--
आसन पर सब बैठ कर, करते हैं आखेट।
भाषा के तो नाम पर, होते लाग-लपेट।।
--
देवनागरी की हुई, मिट्टी आज पलीद।
अब चमचों के राज में, बची नहीं उम्मीद।।

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