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गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

दोहे "बातों का अनुपात" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


सभी तरह की निकलती, बातों में से बात।
बातें देतीं हैं बता, इंसानी औकात।।
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माप नहीं सकते कभी, बातों का अनुपात।
रोके से रुकती नहीं, जब चलती हैं बात।।
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जनसेवक हैं बाँटते, बातों में खैरात।
अच्छी लगती सभी को, चिकनी-चुपड़ी बात।।
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नुक्कड़-नुक्कड़ पर जुड़ी, छोटी-बड़ी जमात।
ठलवे करते हैं जहाँ, बेमतलब की बात।।
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बद से बदतर हो रहे, दुनिया के हालात।
लेकिन मुद्दों पर नहीं, होती कोई बात।।
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बादल नभ पर छा गये, दिन लगता है रात।
गरमी में बरसात की, लोग कर रहे बात।।
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कूड़े-करकट से भरे, नगर और देहात।
मगर दिखावे के लिए, होती सुथरी बात।।
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भूल गये हैं लोग अब, कॉपी-कलम-दवात।
करते हैं सब आजकल, कम्प्यूटर की बात।।
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जीवन के पर्याय हैं, झगड़े-झंझावात।
बैठ आमने-सामने, सुलझाओ सब बात।।
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बातों से मिलती नहीं, हमको कभी निजात।
कहिए मन की बात अब, बातों में है बात।।

1 टिप्पणी:

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