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रविवार, 28 मई 2017

गीत "चीत्कार पसरा है सुर में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सुब सवेरे सहमी-सहमी, 
कोयल आयी मेरे घर में। 
कुहू-कुहू गाने वालों के, 
चीत्कार पसरा है सुर में।।
निर्लज-हठी, कुटिल-कौओं ने, 
उसको बहुत सताया था। 
कुदरत का कानून तोड़कर, 
जंगल राज चलाया था।
बँधी हुई आँगन में रस्सी, 
बैठी गयी उसके ऊपर। 
अनजानी आफत को पाकर, 
काँप रही है, वो थर-थर।
दूषित है परिवेश आज का, 
लगा खून का चस्का है। 
इस दुनिया में अबलाओं की, 
कोई नहीं सुरक्षा है।
चारों ओर छिपे हैं डाकू, 
लूटमार का आलम है। 
लाचारी की दशा देखकर, 
आँख बहातीं शबनम हैं।
इन्सानों के घर में आकर, 
खोज रही ये चैन-अमन। 
अस्मत की खातिर ही इसने, 
छोड़ा अपना बाग-चमन।
लगता है अब इस धरती में,
सबके अन्तस मैले हैं। 
कंस और रावण के वंशज, 
जगह-जगह पर फैले हैं।।

1 टिप्पणी:

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