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सोमवार, 29 मई 2017

दोहे "कहते लोग रसाल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


निर्वाचन ने कर दिया, आज आम को खास।
आम-खास के बीच में, अब लेकिन भरी खटास।।

भरी हुई है आम में, जब तक बहुत मिठास।
तब तक दोनों में रहे, नातेदारी खास।।

आम-खास के खेल में, आम गया है हार।
आम सभी की कर रहा, सदियों से मनुहार।।

खाते-खाते आम को, लोग बन गये खास।
मगर आम की बात का, करते सब उपहास।।
--
आम पिलपिले हो भले, देते हैं आनन्द।
उन्हें चूसने में मिले, वाणी को मकरन्द।।
--
अमुआ अपने देश के, दुनिया में मशहूर।
लेकिन आज गरीब की, हुए पहुँच से दूर।।
--
मीठा-मीठा आम में, भरा हुआ है माल।
इसीलिए तो आम को, कहते लोग रसाल।।

  

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