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शुक्रवार, 19 मई 2017

दोहे "लाइक एक हजार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

असली का युग अब गया, नकली का सम्मान।
छद्मवेश का आजकल, दुनिया में है मान।।
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महिला होता मैं अगरदेते सब उपहार।
खुश करने को सब मुझे, करते प्यार-अपार।।
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चार लाइनों में मिलें, लाइक एक हजार।
टिप्पणियों की कर रहे, सब मजनूँ बौछार।।
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जी करता है मैं अभी, नवखाता लूँ खोल।
लेकिन मन भयभीत है, खुल ना जाये पोल।।
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नर होने पर आज तो, मुझको होता रश्क।
किस्मत अपनी देखकर, बहा रहा हूँ अश्क।।
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नारी के है सामने, नर का निर्बल पक्ष।
आज “रूप” के सदन में, पानी भरते दक्ष।।
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लेकिन मेरे हृदय में, फिर भी है सन्तोष।
हरदम रहती कामना, लेखन हो निर्दोष।।
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लिखकर मैं तुकबन्दियाँ, खुद ही कहता वाह।
इसीलिए तो है नहीं, टिप्पणियों की चाह।।
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आमन्त्रण देते मुझे, हिन्दी के ये छन्द।
छन्दों में लिखकर मुझे, मिलता है आनन्द।।

1 टिप्पणी:

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