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रविवार, 11 जून 2017

दोहे "दूषित है परिवेश" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

लड़की लड़का सी दिखें, लड़के रखते केश।
पौरुष पुरुषों में नहीं, दूषित है परिवेश।।
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देख जमाने की दशा, मन में होता क्षोभ।
लाभ कमाने के लिए, बढ़ता जाता लोभ।।
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भौतिकता की बाढ़ में, घिरा हुआ है देश।
फैशन की आँधी चली, बिगड़ गया है वेश।।
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पूरब में अब आ गये, पश्चिम के सब रोग।
योग छोड़कर भोग को, अपनाते हैं लोग।।
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थोथी-थोथी सी लगें, सरकारी तक़रीर।
कैसे निर्मल हो यहाँ, गंगा जी का नीर।।
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सीमित दस्तावेज तक, सरकारी अभियान।
खूब कमाई कर रहे, सरकारी इंसान।।
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योजनाओं में हो रही, यहाँ दलाली आज।
प्रजातन्त्र में प्रजा की, कौन सुने आवाज।।
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सब कुछ पहले सा वही, नहीं हुआ बदलाव।
दूध-दही की चौकसी, करते यहाँ बिलाव।।
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सब कुछ पहले सा वही, नहीं हुआ बदलाव।
दूध-दही की चौकसी, करते यहाँ बिलाव।।

1 टिप्पणी:

  1. इतना सार्थक सुंदर काव्य सृजन
    आपकी हर रचना सराहनीय है आदरणीय

    उत्तर देंहटाएं

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