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शनिवार, 17 जून 2017

दोहे "अमलतास का रूप" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सबके मन को मोहते, अमलतास के फूल।
शीतलता को बाँटते, मौसम के अनुकूल।१।
--
सूरज झुलसाता बदन, बढ़ा धरा का ताप।
अमलतास तुम पथिक का, हर लेते सन्ताप।२।
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मौन तपस्वी से खड़े, सहते लू की मार।
अमलतास के पेड़ से, बहती सुखद बयार।३।
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पीले झूमर पहनकर, तन को लिया सँवार।
किसे रिझाने के लिए, करते हो सिंगार।४।
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विपदाओं को झेलना, तजना मत मुस्कान।
अमलतास से सीख लो, जीवन का यह ज्ञान।५।
--
गरमी से जब मन हुआ, राही का बेचैन।
छाया का छप्पर छवा, देते तुम सुख-चैन।६।
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गरम थपेड़े मारती, जब अषाढ़ की धूप।
अमलतास का तब हमें, अच्छा लगता “रूप”।७।

3 टिप्‍पणियां:

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