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शनिवार, 3 जून 2017

दोहा गीत "बदले रीति-रिवाज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

हैवानों की होड़ अबकरने लगा समाज।
खौफ नहीं कानून काबदले रीति-रिवाज।।

लोकतन्त्र में न्याय सेहोती अक्सर भूल।
कौआ मोती निगलताहंस फाँकता धूल।।
धनबल-तनबल-राजबलजन-गण रहे पछाड़।
बच जाते मक्कार भीलेकर शक की आड़।।
माँ-बहनों के रूप कीलगती बोली आज।
खौफ नहीं कानून काबदले रीति-रिवाज।१।

मोटी रकम डकार करकरते बहस वकील।
गद्दारों के पक्ष मेंदेते तर्क-दलील।।
नर-नारी की खान कोअबला रहे पुकार।
बेटों को तो लाड़ हैंबेटी को दुत्कार।।
सिंह मानसर में गयेबगुले करते राज।
खौफ नहीं कानून काबदले रीति-रिवाज।२।

पुरुषप्रधान समाज मेंनारी का अपकर्ष।
अबला नारी का भलाकैसे हो उत्कर्ष।।
बेमन से मनते यहाँ, घर में पुत्री पर्व।
बेटी पर करते नहीं, लोग आज भी गर्व।।
भोली चिड़ियों को यहाँ, लील रहे हैं बाज।
खौफ नहीं कानून काबदले रीति-रिवाज।३।

सपनों की सुन्दर फसलअरमानों का बीज।
कल्पनाओं से हो रहीमन में अब तो खीझ।।
बेमौसम की आँधियाँदिखा रही औकात।
कैसे डाली पर टिकेंआज पुराने पात।।
पागल यौवन शान से,  मना रहा ऋतुराज।
खौफ नहीं कानून काबदले रीति-रिवाज।४।

गुलदस्ते में अमन केअमन हो गया गोल।
कौन हमारे चमन मेंछिड़क रहा विषघोल।।
धर्म वहाँ कैसे टिकेजहाँ घृणित हों काम।
काम-पिपासा बढ़ रही,  देख रूप” का घाम।।
कर्मों की गति देख कर, धर्म हुआ मुहताज।
खौफ नहीं कानून काबदले रीति-रिवाज।५। 

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