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रविवार, 4 जून 2017

गीत "बहता तन से बहुत पसीना" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सूरज आग उगलता जाता।
नभ में घन का पता न पाता।१।

जन-जीवन है अकुलाया सा,
कोमल पौधा मुर्झाया सा,
सूखा सम्बन्धों का नाता।
नभ में घन का पता न पाता।२।

सूख रहे हैं बाँध सरोवर,
धूप निगलती आज धरोहर,
रूठ गया है आज विधाता।
नभ में घन का पता न पाता।३।

दादुर जल बिन बहुत उदासा,
चिल्लाता है चातक प्यासा,
थक कर चूर हुआ उद्गाता।
नभ में घन का पता न पाता।४।

बहता तन से बहुत पसीना,
जिसने सारा सुख है छीना,
गर्मी से तन-मन अकुलाता।
नभ में घन का पता न पाता।५।

खेतों में पड़ गयी दरारें,
कब आयेंगी नेह फुहारें,
रूप न ऐसा हमको भाता।
नभ में घन का पता न पाता।६।

4 टिप्‍पणियां:

  1. बस १०-१२ दिन की बात है
    बहुत सुन्दर सामयिक रचना

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी यह रचना पांच लिंकों का आनंद में 8 जून 2017 को लिंक की गई है, चर्चा के लिए आप सादर आमंत्रित हैं। http://halchalwith5links.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  3. दादुर जल बिन बहुत उदासा,
    चिल्लाता है चातक प्यासा,
    थक कर चूर हुआ उद्गाता।
    नभ में घन का पता न पाता।४।
    वाह्ह ! आदरणीय ,बहुत ख़ूब! सुन्दर अभिव्यक्ति, सत्य को उजागर करती आभार। "एकलव्य"

    उत्तर देंहटाएं

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