"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

बुधवार, 19 जुलाई 2017

विविध दोहे ''सीधी-सच्ची बात'' (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

भारत माता के लिएहुए पुत्र बलिदान।
ऐसे बेटों पर सदामाता को अभिमान।१।

दिल से जो है निकलतीवो ही करे कमाल।
बेमन से लिक्खी हुईकविता बने बबाल।२।

राजनीति के खेल मेंकुटिल चला जो चाल।
उसकी जय-जयकार हैउसका ही सब माल।३।

चलते-चलते सफर मेंबन जाते संयोग।
मिलते हैं इसजगत में, सभी तरह के लोग।४।

फल-तरकारी खाइएनिखर जाएगा रंग।
तला-भुना खाकर नहींहोता निर्मल अंग।५।

सीमित शब्दों में कहोसीधी-सच्ची बात।
जली-कटी कहकर कभीदेना मत आघात।६।

उपादान के मर्म कोसमझ लीजिए आज।
धर्म और सत्कर्म सेसुधरे देश-समाज।७।

अनाचार को देखकरलोग हो रहे मौन।
नौका लहरों में फँसीपार लगाये कौन।८।

करती हैं दो पंक्तियाँ, दिल पर करतीं वार।
होता दोहा छन्द है, दोधारी तलवार।९।

सदा कलम से हारतीतोप और तलवार।
सबसे तीखी विश्व मेंशब्दों की है मार।१०।

जो दिल से निकलें वहीसच्चे हैं अशआर।
सच्चे शेरों से सभीकरते प्यार अपार।११।

मानव दानव बन रहाकरता कृत्य जघन्य।
सजा मौत से कम नहींइनको हो अनुमन्य।१२।

जिसकी जैसी सोच हैवैसी उसकी होड़।
कोई मद्धिम चल रहाकोइ लगाता दौड़।१३।

हास और परिहास सेमिलता है आनन्द।
लम्बे जीवन के लिएसूत्र यही निर्द्वन्द।१४।

सोच-सोच में हो गईअपनी उम्र तमाम।
बचा जरा सी ज़िन्दगीकैसे होंगे काम।१५।

सावन सूखा हो रहानहीं बरसते नीर।
निर्धनश्रमिक-किसान कामन हो रहा अधीर।१६।

मिल जाता जब किसी कोउसके मन का मीत।
अंग-अंग में थिरकताप्यारभरा संगीत।१७।

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

बालकविता "नभ पर घटा घिरी है काली" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)




सावन की है छटा निराली
धरती पर पसरी हरियाली

तन-मन सबका मोह रही है
नभ पर घटा घिरी है काली

मोर-मोरनी ने कानन में
नृत्य दिखाकर खुशी मना ली

सड़कों पर काँवड़ियों की भी
घूम रहीं टोली मतवाली

झूम-झूम लहराते पौधे
धानों पर छायीं हैं बाली

दाड़िम, सेब-नाशपाती के,
चेहरे पर छायी है लाली

लेकिन ऐसे में विरहिन का
उर-मन्दिर है खाली-खाली

प्रजातन्त्र के लोभी भँवरे
उपवन में खा रहे दलाली

कैसे निखरे "रूप" गुलों का
करते हैं मक्कारी माली 

सोमवार, 17 जुलाई 2017

ग़ज़ल "रोटी पकाना सीखिए अपने तँदूर पे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब
मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊलु फ़ाइलातु मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
221 2121 1221 212
--
इतना सितम अच्छा नहीं अपने सरूर पे
तुम खुद ही पुरज़माल हो अपने शऊर पे

इंसानियत को दरकिनार कर दिया तुमने
इतना नशे में चूर हो अपने गुरूर पे

दिल से नहीं दिमाग़ से सोचा करो कभी
रोटी पकाना सीखिए अपने तँदूर पे

यूँ अपनी इबादत का दिखावा न कीजिए
ईमान भी तो लाइए अपने हुजूर पे

कितना ग़ुमान “रूप” को अपने फितूर पे
गिनते नहीं हो खामियाँ अपने कसूर पे

रविवार, 16 जुलाई 2017

"हरेला के बारे में जानिए” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

“आज हरेला है”
उत्तराखण्ड की संस्कृति की धरोहर 
“हरेला” 
उत्तराखण्ड का प्रमुख त्यौहार है!

उत्तराखण्ड के परिवेश और खेती के साथ इसका सम्बन्ध विशेषरूप से जुड़ा हुआ है! 
हरेला पर्व वैसे तो वर्ष में तीन बार आता है- 
1- चैत्र मास में!
(प्रथम दिन बोया जाता है तथा नवमी को काटा जाता है!)
2- श्रावण मास में
(सावन लगने से नौ दिन पहले आषाढ़ में बोया जाता है और दस दिन बाद श्रावण के प्रथम दिन काटा जाता है!)
3- आश्विन मास में!
(आश्विम मास में नवरात्र के पहले दिन बोया जाता है और दशहरा के दिन काटा जाता है!)   
किन्तु उत्तराखण्ड में श्रावण मास में पड़ने वाले हरेला को ही अधिक महत्व दिया जाता है! क्योंकि श्रावण मास शंकर भगवान जी को विशेष प्रिय है। यह तो सर्वविदित ही है कि उत्तराखण्ड एक पहाड़ी प्रदेश है और पहाड़ों पर ही भगवान शंकर का वास माना जाता है। इसलिए भी उत्तराखण्ड में श्रावण मास में पड़ने वाले हरेला का अधिक महत्व है!  
सावन लगने से नौ दिन पहले आषाढ़ में हरेला बोने के लिए किसी थालीनुमा पात्र या टोकरी का चयन किया जाता है। इसमें मिट्टी डालकर गेहूँ, जौ, धान, गहत, भट्ट, उड़द, सरसों आदि 5 या 7 प्रकार के बीजों  को बो दिया जाता है। नौ दिनों तक इस पात्र में रोज सुबह को पानी छिड़कते रहते हैं। दसवें दिन इसे काटा जाता है। 
4 से 6 इंच लम्बे इन पौधों को ही हरेला कहा जाता है।
घर के सदस्य इन्हें बहुत आदर के साथ अपने शीश पर रखते हैं।
घर में सुख-समृद्धि के प्रतीक के रूप में हरेला बोया व काटा जाता है!
इसके मूल में यह मान्यता निहित है कि हरेला जितना बड़ा होगा उतनी ही फसल बढ़िया होगी! साथ ही प्रभू से  फसल अच्छी होने की कामना भी की जाती है! 

आज हरेला है !
उत्तराखण्ड के इस पावन पर्व पर  
मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ!!

शनिवार, 15 जुलाई 2017

दोहे "सावन-भादो मास" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बादल छाये गगन में, रिम-झिम पड़ें फुहार।
हरियाली छायी हुई, चमन हुआ गुलजार।।
--
कुहू-कुहू कोकिल करे, कागा करता शोर।
चपला गर्जन कर रही, लगे नाचने मोर।।
--
सड़कों पर है गूँजता, बम भोले का नाद।।
सावन में सब कर रहे, शिव-शंकर को याद।।
--
गंगा जी में नीर का, पावन है भण्डार।
काँवड़ लाने चल पड़े, नर-नारी हरद्वार।।
--
उत्सव प्राणी मात्र के, जीवन के आधार।
आते सावन मास में, कई बड़े त्यौहार।।
--
नागपंचमी-हरेला, रक्षाबन्धन-तीज।
घर-घर में बनते सभी, व्यंजन बहुत लजीज।।
--
श्रवण-मनन के है लिए, सावन-भादो मास।
कण-कण में परमेश का, रहता हरदम वास।।
  


शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

कव्वाली "सिंहासन पर उल्लू भी बिठाये जाते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नजरों से गिराने की ख़ातिरपलकों पे सजाये जाते हैं।
मतलब के लिए सिंहासन पर, उल्लू भी बिठाये जाते हैं।।

जनता ने चुना नहीं जिनको, वो चोर द्वार से आ पहुँचे,
माटी के बुत हैं असरदारसरदार बनाये जाते हैं।

ढका हुआ भाषण से ही, ये लोकतन्त्र का चेहरा है
लोगों को सुनहरी-ख्वाब यहाँ, हर बार दिखाये जाते हैं।

आगे से अरबी घोड़ी है, पीछे से लगती गैया है,
परदेशी दुधारू गैया केनखरे भी उठाये जाते हैं।।

संकर नसलें-संकर फसलें, जब से आई हैं भारत में, 
तब से जन-गण की आँखों में, आँसू ही पाये जाते हैं।

मम्मी जी को तो अपना ही, दामाद बहुत ही भाता है,
निर्धन बेटों की भूमि पर, वो महल बनाये जाते हैं।

गांधी बाबा के खादर में, कब्जा है आज लुटेरों का,
खद्दर की ओढ़ चदरिया को, धन-माल कमाये जाते हैं।

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

गीत "झूल रही हैं ममता-माया"

रिम-झिम करता सावन आया।
गरमी का हो गया सफाया।।

उगे गगन में गहरे बादल,
भरा हुआ जिनमें निर्मल जल,
इन्द्रधनुष ने रूप दिखाया।

श्वेत-श्याम घन बहुत निराले,
आसमान पर डेरा डाले,
कौआ काँव-काँव चिल्लाया।

जोर-शोर से बिजली कड़की,
सहम उठे हैं लड़का-लड़की,
देख चमक सूरज शर्माया।

खेत धान से धानी-धानी,
घर मे पानी बाहर पानी,
मेघों ने पानी बरसाया।

लहरों का स्वरूप है चंगा,
मचल रहीं हैं यमुना-गंगा,
पेड़ों ने नवजीवन पाया।

झूले पड़े हुए घर-घर में,
चहल-पहल है प्रांत-नगर में,
झूल रही हैं ममता-माया।

ठलुओं ने महफिल है जोड़ी,
मजा दे रही चाय-पकौड़ी,
मानसून ने मन भरमाया।

बुधवार, 12 जुलाई 2017

गीत "शृंगार उतर कर मैदानों में आया" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गया आम का मौसम,
प्लम बाजारों में अब छाया।
इनको देख-देख कर देखो,
सबका मन ललचाया।।

लाल-लाल हैं जितने पोलम,
वो हैं खट्टे-मीठे,
लेकिन जो महरून रंग के,
वो लगते हैं मीठे,
पर्वत से शृंगार उतर कर,
मैदानों में आया।

अल्मौड़ा, चौखुटिया,
नैनीताल और चम्पावत,
प्लम के पेड़ों के बागीचे,
फैले हैं बहुतायत,
हरे-भरे इन वृक्षों ने है,
मन को बहुत लुभाया। 

ये मौसम की मार झेलकर,
कितने हुए रसीले,
बारिश का पानी पीकर,
हो जाते नीले-पीले,
बच्चों और बड़ों ने इनको
बहुत चाव से खाया।  

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

गीत "बादल ने नभ में ली अँगड़ाई" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सावन आते ही बादल ने,
नभ में ली अँगड़ाई।
आसमान में श्याम घटाएँ,
उमड़-घुमड़ कर आई।।

भीग रहे हैं खेत-बाग-वन,
गीले हैं चौबारे।
धरती का संताप मिटा,
जब रिमझिम पड़ीं फुहारे।
बच्चों ने काग़ज़ की नौका,
आँगन में तैराई।
आसमान में श्याम घटाएँ,
उमड़-घुमड़ कर आई।।

टर्र-टर्र मेंढक चिल्लाते,
कोयल गाती गाने।
कृषक और मज़दूर चले,
खेतों में धान लगाने।
चौमासे मे ही होती है,
धानों की रोपाई।
आसमान में श्याम घटाएँ,
उमड़-घुमड़ कर आई।।

मचल रहे हैं ताल-तलैया,
उफन रहीं सरिताएँ।
सुख़नवरों के उर-मन्दिर में,
सरस रहीं कविताएँ।
काँवड़ियों की टोली भी,
हर की पौड़ी पर आयी।
आसमान में श्याम घटाएँ,
उमड़-घुमड़ कर आई।।

मौसम का मिज़ाज़ बदला है,
बारिश पर यौवल छाया है।
कंगाली में आटा गीला,
कुटिया में पानी आया है।
जो उपवन वीरान पड़े थे,
उनमें भी हरियाली छाई।
आसमान में श्याम घटाएँ,
उमड़-घुमड़ कर आई।।

सोमवार, 10 जुलाई 2017

दोहे "जय हो देव सुरेश" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सावन आया झूम के, पड़ती हैं बौछार।
बम-भोले की हो रही, अब तो जय-जयकार।।
--
नर-नारी सब मानते, मन से जिन्हें सुरेश।
विध्न विनाशक के पिता, जय हो देव महेश।।
--
काँवड़ लेने को चले, अब नर-नारि अनेक।
पावन गंगा नीर से, होगा शिव अभिषेक।।
--
गंगा जल से आचमन, करते लोग सुधीर।
अमृत से कम है नहीं, गंगा जी का नीर।।
--
पावस का मौसम हमें, देता है सन्देश।
अपने प्यारे चमन का, साफ करो परिवेश।।
--
जो पीता है जहर को, वो पाता है मान।
महादेव शिव बन गये, करके विष का पान।।
--
सच्चे मन से जो करे, शिव-शंकर का ध्यान।
भोले देते हैं उसे, खुश होकर वरदान।।




रविवार, 9 जुलाई 2017

ग़ज़ल "तिज़ारत में सियासत है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जमाना है तिजारत का, तिज़ारत ही तिज़ारत है
तिज़ारत में सियासत है, सियासत में तिज़ारत है

नहीं अब वक़्त है, ईमानदारी का सचाई का
खनक को देखते ही, हो गया ईमान ग़ारत है

हुनर बाज़ार में बिकता, इल्म की बोलियाँ लगतीं
वजीरों का वतन है ये, दलालों का ही भारत है

प्रजा के तन्त्र में कोई, नहीं सुनता प्रजा की है
दिखाने को लिखी, मोटे हरफ में बस इबारत है

हवा का एक झोंका ही धराशायी बना देगा
खड़ी है खोखली बुनियाद पर, ऊँची इमारत है

लगा है घुन नशेमन में, फक़त अब रूप है बाकी
हमारी अंजुमन में तो, निगहेबानी नदारत है

शनिवार, 8 जुलाई 2017

दोहागीत "गुरू पूर्णिमा पर विशेष" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

यज्ञ-हवन करके करो, गुरूदेव का ध्यान।
जग में मिलता है नहींबिना गुरू के ज्ञान।।
भूल गया है आदमी, ऋषियों के सन्देश।
अचरज से हैं देखते, ब्रह्मा-विष्णु-महेश।
गुरू-शिष्य में हो सदा, श्रद्धा-प्यार अपार।
गुरू पूर्णिमा पर्व को, करो आज साकार।
गुरु की महिमा का करूँ, कैसे आज बखान
जग में मिलता है नहींबिना गुरू के ज्ञान।(१)
संस्कार देता गुरूपाता सिख अमिताभ।
बिना दीक्षा के नहींशिक्षा का कुछ लाभ।
अन्तस को दे रौशनीगुरू ज्योति का पुंज।
गुरु के शुभ आशीष सेसुरभित होय निकुंज।
सद्गुरु अपने शिष्य को, देता हरदम ज्ञान।
जग में मिलता है नहींबिना गुरू के ज्ञान।(२)

तीन गुरू संसार में, मात-पिता-आचार्य।
इन तीनों की कृपा से, बनते सारे कार्य।
आया कैसा समय है, बदल गयी है रीत।
गुरुओं के प्रति है नहीं, पहले जैसी प्रीत।
श्रद्धा के बिन शिष्य का, कैसे हो उत्थान।
जग में मिलता है नहींबिना गुरू के ज्ञान। (३)

दुराचरण की नाक में, कैसे पड़े नकेल।
सम्बन्धों की विश्व में, सूख रही है बेल।
मर्यादा दम तोड़ती, बिगड़ गया परिवेश।
बदनामी को झेलता, राम-कृष्ण का देश।
कदम-कदम पर हो रहा, गुरुओ का अपमान।
जग में मिलता है नहींबिना गुरू के ज्ञान। (४)

पश्चिम की अश्लीलता, अपनाते हैं लोग।
भोगवाद को देखकर, सहम गया है योग।
अब तो पूजा-पाठ से, मोह हो गया भंग।
सी.ड़ी. में ही कर रहे, पण्डित जी सत्संग।
गिरगिट जैसा रंग अब, बदल रहा इंसान।
जग में मिलता है नहींबिना गुरू के ज्ञान।(५)

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails