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गुरुवार, 3 अगस्त 2017

दोहे "राखी के ये तार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

आता सावन मास में, राखी का त्यौहार।
भाई अपनी बहन को, देते हैं उपहार।।

कच्चे धागों में बँधा, ममता और दुलार।
सम्बन्धों के पाश हैं, राखी के ये तार।।

जरी-सूत या जूट के, या रेशम के तार।
रचा-बसा हर तार में, बहना का है प्यार।।

आडम्बर से हीन है, पावन रक्षा पर्व।
अपने भइया पर करें, सारी बहनें गर्व।।

राखीबन्धन धरम का, नहीं रहा मुहताज।
इसीलिए तो आज भी, बदला नहीं रिवाज।।

2 टिप्‍पणियां:

  1. राखीबन्धन धरम का, नहीं रहा मुहताज।
    इसीलिए तो आज भी, बदला नहीं रिवाज।
    .. बहुत सुन्दर ,,,

    उत्तर देंहटाएं

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