"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

गुरुवार, 31 अगस्त 2017

ग़ज़ल "सन्तों के भेष में छिपे, हैवान आज तो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


खुद को खुदा समझ रहा, इंसान आज तो
मुट्ठी में है सिमट गया जहान आज तो

कैसे सुधार हो भला, अपने समाज का
कौड़ी के मोल बिक रहा, ईमान आज तो

भरकर लिबास आ गये, शेरों का भेड़िए
सन्तों के भेष में छिपे, हैवान आज तो

जिसको नहीं है इल्म वो इलहाम बाँटता
उड़ता बग़ैर पंख के नादान आज तो

अब लोकतन्त्र में हुई कौओं की मौज़ है
चिड़िया का घोंसला हुआ सुनसान आज तो

ज़न्नत के ख़्वाब को दिखा उपदेश बेचते
चलने लगी अधर्म की दुकान आज तो

सन्तों को सुरक्षा की ज़रूरत है किसलिए?
बौना हुआ है देश का विधान आज तो

मिलते हैं सभी ऐश के सामान जेल में
बौना सा हो गया यहाँ, भगवान आज तो

रावण छिपे हैं आज राम के लिबास में
मुश्किल हुई है “रूप” की पहचान आज तो

1 टिप्पणी:

  1. आदरनीय शास्त्री जी बहुत गंभीर विषय को आपने उठाया है वास्तव में एसब देश में एक असामाजिक तत्वों को पनपने का मौक़ा दिया अंधविश्वास पैदा किया |देश की छवि को ठेस पहुचाया है | घोर निंदा के योग्य कहा जा सकता है और समाज को आगाह किये जाने की आवश्यकता पर बल दिया जाना चाहिए जिससे लोगों में भटकाव को रोका जा सके |इनकी वजह से देश के अच्छे संतों को दुःख की अनुभूति होनी स्वाभाविक है |

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails