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गुरुवार, 31 अगस्त 2017

गीत "सिर्फ खरीदार मिले" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


वफा की राह में, घर से निकल पड़े हम तो,

डगर में फैले हुए हमको सिर्फ खार मिले!
खुशी की चाह में, भटके गली-गली हम तो,
उदास चेहरे सिसकते हुए हजार मिले!!

हमारे साथ तो बस दिल की दौलतें ही थी,
खुदा की बख्शी हुई चन्द नेमतें ही थी,
मगर यहाँ तो हमें सिर्फ खरीदार मिले!
उदास चेहरे सिसकते हुए हजार मिले!!

दिवस अन्धेरे थे और रात जगमगाती थी,
सुनहरे पिंजड़ों में चिड़ियाएँ फड़फड़ाती थी,
वतनपरस्त यहाँ भी तो गुनहगार मिले!
उदास चेहरे सिसकते हुए हजार मिले!!

पाने चले सुकून को, लेकिन करार खो बैठे,
बिरानी बस्ती में आकर बहार खो बैठे,
शिकारी खुद यहाँ होते हुए शिकार मिले!

उदास चेहरे सिसकते हुए हजार मिले!!

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