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शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

ग़ज़ल "गूँगे और बहरे हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


हँसी भी है-खुशी भी है, तमन्नाओं की लहरे हैं
तभी नमकीन पानी में, बहुत से लोग ठहरे हैं
उमड़ती भावनाएँ जब, तभी तो ज्वार आता है
समन्दर की तलहटी में, पड़े माणिक सुनहरे हैं
कई सदियों से डूबी हैं, यहाँ गुस्ताख़ चट्टानें,
अभी इन कन्दराओं में, बसे असुरों के चेहरे हैं
मधुर जल से तुम्हें भरती, हमेशा पावनी गंगा
हुआ फिर नीर क्यों खारा, लगे क्यों आज पहरे हैं
बड़ी हसरत थी कोई तो, जुबां अपनी हिलायेगा
मगर इस जग के बाशिन्दे, तो गूँगे और बहरे हैं
लरजता “रूप” सरिता का, हुआ खामोश है अब तो
दिये हैं घाव जो दिल में, समन्दर से भी गहरे हैं

4 टिप्‍पणियां:

  1. कई सदियों से डूबी हैं, यहाँ गुस्ताख़ चट्टानें,
    अभी इन कन्दराओं में, बसे असुरों के चेहरे हैं
    मधुर जल से तुम्हें भरती, हमेशा पावनी गंगा
    हुआ फिर नीर क्यों खारा, लगे क्यों आज पहरे हैं
    ...बहुत सुन्दर...

    उत्तर देंहटाएं
  2. बड़ी हसरत थी कोई तो, जुबां अपनी हिलायेगा
    मगर इस जग के बाशिन्दे, तो गूँगे और बहरे हैं !
    ....कभी तो कटाक्ष भी कटार बन जाते थे, लोग उनसे भी सीख लेते थे । अब तो गूँगे और बहरे के साथ संज्ञाहीन, संवेदनाहीन भी हो गए ! सुंदर रचना । सादर प्रणाम ।

    उत्तर देंहटाएं

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