"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

मंगलवार, 24 अक्तूबर 2017

गीत "बुखार ही बुखार है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नशा है चढ़ा हुआ, खुमार ही खुमार है।
तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।

मुश्किलों में हैं सभी, फिर भी धुन में मस्त है,
ताप के प्रकोप से, आज सभी ग्रस्त हैं,
आन-बान, शान-दान, स्वार्थ में शुमार है।
तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।

हो गये उलट-पलट, वायदे समाज के,
दीमकों ने चाट लिए, कायदे रिवाज़ के,
प्रीत के विमान पर, सम्पदा सवार है।
तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।

अंजुमन पे आज, सारा तन्त्र है टिका हुआ,
आज उसी वाटिका का, हर सुमन बिका हुआ,
गुल गुलाम बन गये, खार पर निखार है।
तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।

झूठ के प्रभाव से, सत्य है डरा हुआ,
बेबसी के भाव से, आदमी मरा हुआ,
राम के ही देश में, राम बेकरार है।
तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।

सोमवार, 23 अक्तूबर 2017

दोहे "दो आँखों की रीत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


कह देती हैं सहज ही, सुख-दुख-करुणा-प्यार।
कुदरत ने हमको दिया, आँखों का उपहार।।
--
आँखें नश्वर देह का, बेशकीमती अंग।
बिना रौशनी के लगे, सारा जग बेरंग।।
--
मिल जाती है आँख जब, तब आ जाता चैन।
गैरों को अपना करें, चंचल चितवन नैन।।
--
दुनिया में होती अलग, दो आँखों की रीत।
होती आँखें चार तो, बढ़ जाती है प्रीत।।
--
पोथी में जिनका नहीं, कोई भी उल्लेख।
आँखें पढ़ना जानती, वो सारे अभिलेख।।
--
माता-पत्नी-बहन से, कैसा हो व्यवहार।
आँखें ही पहचानतीं, रिश्तों का आकार।।
--
सम्बन्धों में हो रहा, कहाँ-कहाँ व्यापार।
आँखों से होता प्रकट, घृणा और सत्कार।।

रविवार, 22 अक्तूबर 2017

गीत "गुरूनानक का दरबार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


ये गुरूनानक का दरबार।

दर्शन कर लो बारम्बार।।
IMG_2434IMG_2444लगा हुआ नानकमत्ता में, दीवाली का मेला,
कृपाणों की दूकानें और फूलों का है ठेला,
मनचाहा ले लो उपहार।
दर्शन कर लो बारम्बार।।
IMG_2437देखो-देखो कितने सुन्दर कंघे, कड़े-खिलौने,
मन को आकर्षित करते हैं सुन्दर चित्र सलोने,
सामानों की है भरमार।
दर्शन कर लो बारम्बार।।

IMG_2441गड़े हुए हैं इस मेले में ऊँचे-ऊँचे झूले,
देख-देख इनको बच्चों के मन खुशियो से फूले,
उत्सव से सबको है प्यार।
दर्शन कर लो बारम्बार।।
IMG_2443IMG_2439हीं मौत का कुआँ कहीं पर सर्कस लगा अनोखा,
इन्द्रज़ाल को दिखला कर जादूगर देता धोखा,
करतब दिखलाती हैं कार।
दर्शन कर लो बारम्बार।।

IMG_2445उत्सव के इस महाकुम्भ में छाई हैं तरुणाई,
मनचाही चीजें लेने को आये लोग लुगाई,
उमड़ा है मानों संसार।
दर्शन कर लो बारम्बार।।

IMG_2446पाषाणो को छाँट रहे हैं मानुष हट्टे-कट्टे,
गाँवों से महिलाएँ आयीं लेने को सिलबट्टे,

थोड़े दिन का है बाज़ार।
दर्शन कर लो बारम्बार।।

शनिवार, 21 अक्तूबर 2017

दोहे भइयादूज "पावन प्यार-दुलार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

यज्ञ-हवन करके बहन, माँग रही वरदान।
भइया का यमदेवता, करना तुम कल्याण।।
--
भाई बहन के प्यार का, भइया-दोयज पर्व।
अपने-अपने भाई पर, हर बहना को गर्व।।
--
तिलक दूज का कर रहीं, सारी बहनें आज।
सभी भाइयों के बने, सारे बिगड़े काज।।
--
रोली-अक्षत-पुष्प का, पूजा का ले थाल।
बहन आरती कर रही, मंगल दीपक बाल।।
--
एक बरस में एक दिन, आता ये त्यौहार।
अपनी रक्षा का बहन, माँग रही उपहार।।
--
जब तक सूरज-चन्द्रमा, तब तक जीवित प्यार।
दौलत से मत तोलना, पावन प्यार-दुलार।।

गीत "भइया दूज का तिलक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आज भइया दूज के पावन अवसर पर 
अपना एक पुराना गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ!
मेरे भइया तुम्हारी हो लम्बी उमर,
 कर रही हूँ प्रभू से यही कामना।
लग जाये किसी की न तुमको नजर,
दूज के इस तिलक में यही भावना।।

चन्द्रमा की कला की तरह तुम बढ़ो,
उन्नति के शिखर पर हमेशा चढ़ो,
कष्ट और क्लेश से हो नही सामना।
दूज के इस तिलक में यही भावना।।


थालियाँ रोली चन्दन की सजती रहें,
सुख की शहनाइयाँ रोज बजती रहें,
 हों सफल भाइयों की सभी साधना।
दूज के इस तिलक में यही भावना।। 

रोशनी से भरे दीप जलते रहें,
नेह के सिन्धु नयनों में पलते रहें,
आज बहनों की हैं ये ही आराधना।
दूज के इस तिलक में यही भावना।।

शुक्रवार, 20 अक्तूबर 2017

दोहे "माटी के ये दीप" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

झिलमिल-झिलमिल जल रहे, माटी के ये दीप।
देवताओं के चित्र के, रखना इन्हें समीप।।
--
दीपों की दीपावली, देती है सन्देश।
घर-आँगन के साथ में, रौशन हो परिवेश।।
--
पाकर बाती-नेह को, लुटा रहा है नूर।
नन्हा दीपक कर रहा, अन्धकार को दूर।।
--
लछमी और गणेश के, रहें शारदा साथ।
चरणों में इनके सदा, रोज झुकाओ माथ।।
--
कभी विदेशी माल का, करना मत उपयोग।
सदा स्वदेशी का करो, जीवन में उपभोग।।
--
मेरे भारतवासियों, ऐसा करो चरित्र।
दौलत अपने देश की, रखो देश में मित्र।।

गीत "भाईदूज के अवसर पर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


भइया की लम्बी आयु का,
माँग रहीं है यम से वर।
मंगलतिलक लगाती बहना,
भाईदूज के अवसर पर।।

चन्द्रकला की तरह बढ़ो,
तुम उन्नति के सोपान चढ़ो।
शीतल-धवल रौशनी से,
आलोकित कर दो आँगन-घर।
मंगलतिलक लगाती बहना,
भाईदूज के अवसर पर।।

इक आँगन में खेले-कूदे,
इक आँगन में बड़े हुए,
मात-पिता की पकड़ अंगुली,
धरती पर हम खड़े हुए,
नहीं भूलना भइया मुझको,
तीज और त्यौहारों पर।
मंगलतिलक लगाती बहना,
भाईदूज के अवसर पर।।

कभी न भइया के उपवन में,
फैला तम का डेरा हो,
जीवन की खिलती बगिया में,
कभी न गम का घेरा हो,
सदा रहे मुस्कान सहज,
मेरे भाई के आनन पर।
मंगलतिलक लगाती बहना,
भाईदूज के अवसर पर।।

गुरुवार, 19 अक्तूबर 2017

दोहे "गोवर्धन पूजा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
अन्नकूट पूजा करो, गोवर्धन है आज।
गोरक्षा से सबल हो, पूरा देश समाज।१।

श्रीकृष्ण ने कर दिया, माँ का ऊँचा भाल।
सेवा करके गाय की, कहलाये गोपाल।२।

गौमाता से ही मिले, दूध-दही, नवनीत।
सबको होनी चाहिए, गौमाता से प्रीत।३।

गइया के घी-दूध से, बढ़ जाता है ज्ञान।
दुग्धपान करके बने, नौनिहाल बलवान।४।

कैमीकल का उर्वरक, कर देगा बरबाद।
फसलों में डालो सदा, गोबर की ही खाद।५।

दोहे "दीवाली पर देवता, रहते तभी समीप" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दीवाली पर शारदे, करना यह उपकार।
जीवनभर सुनता रहूँ, वीणा की झंकार।।

जलें सभी के नीड़ में, माटी के जब दीप।
दीवाली पर देवता, रहते तभी समीप।।

दीप जलाने के लिए, हो बाती में तेल।
तब ही तम की नाक में, डालें दीप नकेल।।

ब्रह्मा जी ने रच दिये, अलग-अलग आकार।
किन्तु एक ही रूप के, रचता पात्र कुम्हार।।

स्वस्थ रहे सब जगत में, दाता दो वरदान।
बरखा-गरमी-शीत में, दुखी न हो इंसान।।

ज्ञान बाँटने से मनुज, होता नहीं विपन्न।
विद्या धन का दानकर, बन जाओ सम्पन्न।।

मात शारदे को कभी, मत बिसराना मित्र।
मेधावी मेधा करे, उन्नत करे चरित्र।।

गीत "भा रही दीपावली" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दीप खुशियों के जलाओ, आ रही दीपावली।
रौशनी से जगमगाती, भा रही दीपावली।।

क्या करेगा तम वहाँ, होंगे अगर नन्हें दिये,
चाँद-तारों को करीने से, अगर रौशन किये,
हार जायेगी अमावस, छा रही दीपावली।

नित्य घर में नेह के, दीपक जलाना चाहिए,
उत्सवों को हर्ष से, हमको मनाना चाहिए,
पथ हमें प्रकाश का, दिखला रही दीपावली।

शायरों को शम्मा से, कवियों को दीपक से लगाव,
महकते मिष्ठान से, होता सभी को है लगाव,
गीत-ग़ज़लों का तराना, गा रही दीपावली।

गजानन के साथ, लक्ष्मी-शारदा की वन्दना,
देवताओं के लिए अब, द्वार करना बन्द ना,
मन्त्र को उत्कर्ष के, सिखला रही दीपावली। 

बुधवार, 18 अक्तूबर 2017

"धनतेरस, नर्क चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धनपूजा और भइयादूज की शुभकामनाएँ"







आलोकित हो वतन हमारा।
हो सारे जग में उजियारा।।

कंचन जैसा तन चमका हो,
उल्लासों से मन दमका हो,
खुशियों से महके चौबारा।
हो सारे जग में उजियारा।।

आओ अल्पना आज सजाएँ,
माता से धन का वर पाएँ,
आओ दूर करें अँधियारा।
हो सारे जग में उजियारा।।

घर-घर बँधी हुई हो गैया,
तब आयेगी सोन चिरैया,
सुख का सरसेगा फव्वारा।
होगा तब जग में उजियारा।।

आलोकित हो वतन हमारा।
हो सारे जग में उजियारा।।

♥♥♥

पर्वों की शृंखला में
आप सभी को
धनतेरस,
नर्क चतुर्दशी,
दीपावली,
गोवर्धनपूजा
और
भइयादूज की
हार्दिक शुभकामनाएँ!
♥ डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

गीत "मधुर वाणी बनाएँ हम" (दीपावली की शुभकामनाएँ)

हुआ मौसम गुलाबी अब,
चलो दीपक जलाएँ हम।
घरों में धान आये हैं,
दिवाली को मनाएँ हम।

बढ़ी है हाट में रौनक,
सजी फिर से दुकानें हैं,
मधुर मिष्ठान को खाकर,
मधुर वाणी बनाएँ हम।

मनो-मालिन्य को अपने,
मिटाने का समय है अब,
घरों के साथ आँगन को,
करीने से सजाएँ हम।

छँटें बादल गगन से हैं,
हुए निर्मल सरोवर हैं,
चलो तालाब में अपने,
कमल मोहक खिलाएँ हम।

सुमन आवाज देते हैं,
चलो सींचे बगीचों को,
चमन मैं आज फिर से,
कुछ नये पौधे उगाएँ हम।

मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

गीत "दीप खुशियों के जलें" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

आओ फिर से हम नये, उपहार की बातें करें
प्यार का मौसम हैआओ प्यार की बातें करें।

नेह की लेकर मथानीसिन्धु का मन्थन करें,
छोड़ कर छल-छद्मकुछ उपकार की बातें करें।

आस का अंकुर उगाओदीप खुशियों के जलें,
प्रीत का संसार हैसंसार की बातें करें।

भावनाओं के नगर मेंछेड़ दो वीणा के सुर,
घर सजायें स्वर्ग सामनुहार की बातें करें।

कदम आगे तो बढ़ाओसामने मंजिल खड़ी,
जीत के माहौल हैक्यों हार की बातें करें।

जिधर देखो, उधर ही है, बोलबाला “रूप” का,
सादगी के साथ हम, अधिकार की बातें करें।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails