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मंगलवार, 31 अक्तूबर 2017

गीत "याद बहुत आते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

घर-आँगन वो बाग सलोने, याद बहुत आते हैं
बचपन के सब खेल-खिलौने, याद बहुत आते हैं

जब हम गर्मी में की छुट्टी में, रोज नुमाइश जाते थे
इस मेले को दूर-दूर से, लोग देखने आते थे
सर्कस की वो हँसी-ठिठोली, भूल नहीं पाये अब तक
जादू-टोने, जोकर-बौने, याद बहुत आते हैं
बचपन के सब खेल-खिलौने, याद बहुत आते हैं

शादी हो या छठी-जसूठन, मिलकर सभी मनाते थे
आस-पास के लोग प्रेम से, दावत खाने आते थे
अब कितना बदलाव हो गया, अपने रस्म-रिवाजो में
दावत के वो पत्तल-दोने याद बहुत आते हैं
बचपन के सब खेल-खिलौने, याद बहुत आते हैं

कभी-कभी हम जंगल से भी, सूखी लकड़ी लाते थे
उछल-कूद कर वन के प्राणी, निज करतब दिखलाते थे
वानर-हिरन-मोर की बोली, गूँज रही अब तक मन में
जंगल के निश्छल मृग-छौने याद बहुत आते हैं
बचपन के सब खेल-खिलौने, याद बहुत आते हैं

लुका-छिपी और आँख-मिचौली, मन को बहुत लुभाते थे
कुश्ती और कबड्डी में, सब दाँव-पेंच दिखलाते थे
होले भून-भून कर खाते, खेत और खलिहानों में
घर-आँगन के कोने-कोने याद बहुत आते हैं
बचपन के सब खेल-खिलौने, याद बहुत आते हैं

रविवार, 29 अक्तूबर 2017

गीत "आँखों के बिन जग सूना है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आशा और निराशा की जो,
पढ़ लेते हैं सारी भाषा।
दो नयनों में ही होती हैं,
दुनिया की पूरी परिभाषा।।

दुख के बादल आते ही ये,
खारे जल को हैं बरसाते।
सुख का जब अनुभव होता है,
तब ये फूले नहीं समाते।
सरल बहुत हैं-चंचल भी हैं,
इनके भीतर भरी पिपासा।
दो नयनों में ही होती हैं,
दुनिया की पूरी परिभाषा।।

कुछ में होती है खुद्दारी,
कुछ में होती है मक्कारी।
कुछ ऐसी भी आँखें होती,
जिनमें होती है गद्दारी।
ऐसी बे-ग़ैरत आँखों से,
मन में होती बहुत हताशा।
दो नयनों में ही होती हैं,
दुनिया की पूरी परिभाषा।।

दुनिया भर की सरिताओं का,
इसमें आकर पानी ठहरा।
लहर-लहरकर लहरें उठतीं,
ये भावों का सागर गहरा।
बिन आँखों के जग सूना है,
ये जीवन की हैं अभिलाषा।
दो नयनों में ही होती हैं,
दुनिया की पूरी परिभाषा।।

शनिवार, 28 अक्तूबर 2017

गीत "उल्फत के ठिकाने खो गये हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कल नये थे अब पुराने हो गये हैं।
पेड़ जंगल के सयाने हो गये हैं।।

वक्त की रफ्तार ने जीना सिखाया,
जिन्दगी ने व्याकरण को है भुलाया,
प्यार-उल्फत के ठिकाने खो गये हैं।

अब तरानों में नहीं वो आग है,
सुर नहीं, बस बेसुरा सा राग है,
चहकते नक्कारखाने सो गये हैं।

शब्द बदले और कोमल भाव बदले,
अर्थ बदले, प्रीत के अनुभाव बदले,
चूर सपने सब सुहाने हो गये हैं।

स्वार्थ के रँग में रँगे अनुबन्ध हैं,
बस दिखावे के लिए सम्बन्ध हैं,
“रूप” अपने भी बिराने हो गये हैं।

शुक्रवार, 27 अक्तूबर 2017

ग़ज़ल "ज़िन्दगी इक खूबसूरत ख़्वाब है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

ज़िन्दगी इक खूबसूरत ख़्वाब है
रात में उगता हुआ माहताब है

था कभी ओझल हुआ जो रास्ता
अब नज़र आने लगा मेहराब है

आसमां से छँट गयीं अब बदलियाँ
अब खुशी का आ गया सैलाब है

पत्थरों में प्यार का ज़ज़्बा बढ़ा
अब बगीचे में ग़ुलों पर आब है

फूल पर मँडरा रहा भँवरा रसिक
एक बोसे के लिए बेताब है

 शाम ढलने पर कुमुद हँसने लगे
भा रहा कीचड़ भरा तालाब है

रोज़ आती रौशनी की रश्मियाँ
ख़्वाब का ये “रूप” भी नायाब है

गुरुवार, 26 अक्तूबर 2017

दोहे "छठ का है त्यौहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

छठपूजा का आ गया, फिर पावन त्यौहार।
माता जन-गण के हरो, अब तो सभी विकार।।

लोग छोड़कर आ गये, अपने-अपने नीड़।
सरिताओं के तीर पर, लगी हुई है भीड़।।

अस्तांचल की ओर जब, रवि करता प्रस्थान।
छठ पूजा पर अर्घ्य तब, देता हिन्दुस्थान।।

परम्पराओं पर टिका, सारा कारोबार।
मान्यताओं में है छिपा, जीवन का सब सार।।

षष्टी मइया सभी का, करती बेड़ा पार।
माता ही सन्तान को, करती प्यार अपार।।

छठपूजा के दिवस पर, कर लेना उपवास।
अन्तर्मन से कीजिए, माता की अरदास।।

उदित-अस्त रवि को सदा, अर्घ्य चढ़ाना नित्य।
देता है जड़-जगत को, नवजीवन आदित्य।।

कठिन तपस्या के लिए, छठ का है त्यौहार।
व्रत पूरा करके करो, ग्रहण शुद्ध आहार।।

पूर्वांचल से हो गया, छठ माँ का उद्घोष।
दुनियाभर में किसी का, रहे न खाली कोष।।




बुधवार, 25 अक्तूबर 2017

दोहे "धन का खुल्ला खेल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


भाषा-भूषा-प्रान्त का, लोग करें गुणगान।
जात-धर्म के जाल में, जकड़ा हिन्दुस्तान।।
--
लुप्त हो गये आज तो, आपस के सम्बन्ध।
सम्बन्धों के नाम पर, होते हैं अनुबन्ध।।
--
मर्यादा को सदा ही, मिलता है वनवास।
माला कैसे अब बने, मनके हुए उदास।।
--
लोकतन्त्र के नाम पर, पाया जंगलराज।
आजादी तो मिल गयी, आया नहीं सुराज।।
--
 उपवन में बढ़ने लगी, अब तो विष की बेल।
मतलब के ही है लिए, आपस में सब मेल।।
--
बलशाली की यातना, लोग रहे हैं झेल।
निर्वाचन में हो रहा, धन का खुल्ला खेल।।
--
भूल गये हैं अब सभी, गौरव और गुमान।
मात-पिता, आचार्य का, होता है अपमान।। 

मंगलवार, 24 अक्तूबर 2017

गीत "बुखार ही बुखार है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नशा है चढ़ा हुआ, खुमार ही खुमार है।
तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।

मुश्किलों में हैं सभी, फिर भी धुन में मस्त है,
ताप के प्रकोप से, आज सभी ग्रस्त हैं,
आन-बान, शान-दान, स्वार्थ में शुमार है।
तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।

हो गये उलट-पलट, वायदे समाज के,
दीमकों ने चाट लिए, कायदे रिवाज़ के,
प्रीत के विमान पर, सम्पदा सवार है।
तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।

अंजुमन पे आज, सारा तन्त्र है टिका हुआ,
आज उसी वाटिका का, हर सुमन बिका हुआ,
गुल गुलाम बन गये, खार पर निखार है।
तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।

झूठ के प्रभाव से, सत्य है डरा हुआ,
बेबसी के भाव से, आदमी मरा हुआ,
राम के ही देश में, राम बेकरार है।
तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।

सोमवार, 23 अक्तूबर 2017

दोहे "दो आँखों की रीत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


कह देती हैं सहज ही, सुख-दुख-करुणा-प्यार।
कुदरत ने हमको दिया, आँखों का उपहार।।
--
आँखें नश्वर देह का, बेशकीमती अंग।
बिना रौशनी के लगे, सारा जग बेरंग।।
--
मिल जाती है आँख जब, तब आ जाता चैन।
गैरों को अपना करें, चंचल चितवन नैन।।
--
दुनिया में होती अलग, दो आँखों की रीत।
होती आँखें चार तो, बढ़ जाती है प्रीत।।
--
पोथी में जिनका नहीं, कोई भी उल्लेख।
आँखें पढ़ना जानती, वो सारे अभिलेख।।
--
माता-पत्नी-बहन से, कैसा हो व्यवहार।
आँखें ही पहचानतीं, रिश्तों का आकार।।
--
सम्बन्धों में हो रहा, कहाँ-कहाँ व्यापार।
आँखों से होता प्रकट, घृणा और सत्कार।।

रविवार, 22 अक्तूबर 2017

गीत "गुरूनानक का दरबार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


ये गुरूनानक का दरबार।

दर्शन कर लो बारम्बार।।
IMG_2434IMG_2444लगा हुआ नानकमत्ता में, दीवाली का मेला,
कृपाणों की दूकानें और फूलों का है ठेला,
मनचाहा ले लो उपहार।
दर्शन कर लो बारम्बार।।
IMG_2437देखो-देखो कितने सुन्दर कंघे, कड़े-खिलौने,
मन को आकर्षित करते हैं सुन्दर चित्र सलोने,
सामानों की है भरमार।
दर्शन कर लो बारम्बार।।

IMG_2441गड़े हुए हैं इस मेले में ऊँचे-ऊँचे झूले,
देख-देख इनको बच्चों के मन खुशियो से फूले,
उत्सव से सबको है प्यार।
दर्शन कर लो बारम्बार।।
IMG_2443IMG_2439हीं मौत का कुआँ कहीं पर सर्कस लगा अनोखा,
इन्द्रज़ाल को दिखला कर जादूगर देता धोखा,
करतब दिखलाती हैं कार।
दर्शन कर लो बारम्बार।।

IMG_2445उत्सव के इस महाकुम्भ में छाई हैं तरुणाई,
मनचाही चीजें लेने को आये लोग लुगाई,
उमड़ा है मानों संसार।
दर्शन कर लो बारम्बार।।

IMG_2446पाषाणो को छाँट रहे हैं मानुष हट्टे-कट्टे,
गाँवों से महिलाएँ आयीं लेने को सिलबट्टे,

थोड़े दिन का है बाज़ार।
दर्शन कर लो बारम्बार।।

शनिवार, 21 अक्तूबर 2017

दोहे भइयादूज "पावन प्यार-दुलार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

यज्ञ-हवन करके बहन, माँग रही वरदान।
भइया का यमदेवता, करना तुम कल्याण।।
--
भाई बहन के प्यार का, भइया-दोयज पर्व।
अपने-अपने भाई पर, हर बहना को गर्व।।
--
तिलक दूज का कर रहीं, सारी बहनें आज।
सभी भाइयों के बने, सारे बिगड़े काज।।
--
रोली-अक्षत-पुष्प का, पूजा का ले थाल।
बहन आरती कर रही, मंगल दीपक बाल।।
--
एक बरस में एक दिन, आता ये त्यौहार।
अपनी रक्षा का बहन, माँग रही उपहार।।
--
जब तक सूरज-चन्द्रमा, तब तक जीवित प्यार।
दौलत से मत तोलना, पावन प्यार-दुलार।।

गीत "भइया दूज का तिलक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आज भइया दूज के पावन अवसर पर 
अपना एक पुराना गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ!
मेरे भइया तुम्हारी हो लम्बी उमर,
 कर रही हूँ प्रभू से यही कामना।
लग जाये किसी की न तुमको नजर,
दूज के इस तिलक में यही भावना।।

चन्द्रमा की कला की तरह तुम बढ़ो,
उन्नति के शिखर पर हमेशा चढ़ो,
कष्ट और क्लेश से हो नही सामना।
दूज के इस तिलक में यही भावना।।


थालियाँ रोली चन्दन की सजती रहें,
सुख की शहनाइयाँ रोज बजती रहें,
 हों सफल भाइयों की सभी साधना।
दूज के इस तिलक में यही भावना।। 

रोशनी से भरे दीप जलते रहें,
नेह के सिन्धु नयनों में पलते रहें,
आज बहनों की हैं ये ही आराधना।
दूज के इस तिलक में यही भावना।।

शुक्रवार, 20 अक्तूबर 2017

दोहे "माटी के ये दीप" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

झिलमिल-झिलमिल जल रहे, माटी के ये दीप।
देवताओं के चित्र के, रखना इन्हें समीप।।
--
दीपों की दीपावली, देती है सन्देश।
घर-आँगन के साथ में, रौशन हो परिवेश।।
--
पाकर बाती-नेह को, लुटा रहा है नूर।
नन्हा दीपक कर रहा, अन्धकार को दूर।।
--
लछमी और गणेश के, रहें शारदा साथ।
चरणों में इनके सदा, रोज झुकाओ माथ।।
--
कभी विदेशी माल का, करना मत उपयोग।
सदा स्वदेशी का करो, जीवन में उपभोग।।
--
मेरे भारतवासियों, ऐसा करो चरित्र।
दौलत अपने देश की, रखो देश में मित्र।।

गीत "भाईदूज के अवसर पर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


भइया की लम्बी आयु का,
माँग रहीं है यम से वर।
मंगलतिलक लगाती बहना,
भाईदूज के अवसर पर।।

चन्द्रकला की तरह बढ़ो,
तुम उन्नति के सोपान चढ़ो।
शीतल-धवल रौशनी से,
आलोकित कर दो आँगन-घर।
मंगलतिलक लगाती बहना,
भाईदूज के अवसर पर।।

इक आँगन में खेले-कूदे,
इक आँगन में बड़े हुए,
मात-पिता की पकड़ अंगुली,
धरती पर हम खड़े हुए,
नहीं भूलना भइया मुझको,
तीज और त्यौहारों पर।
मंगलतिलक लगाती बहना,
भाईदूज के अवसर पर।।

कभी न भइया के उपवन में,
फैला तम का डेरा हो,
जीवन की खिलती बगिया में,
कभी न गम का घेरा हो,
सदा रहे मुस्कान सहज,
मेरे भाई के आनन पर।
मंगलतिलक लगाती बहना,
भाईदूज के अवसर पर।।

गुरुवार, 19 अक्तूबर 2017

दोहे "गोवर्धन पूजा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
अन्नकूट पूजा करो, गोवर्धन है आज।
गोरक्षा से सबल हो, पूरा देश समाज।१।

श्रीकृष्ण ने कर दिया, माँ का ऊँचा भाल।
सेवा करके गाय की, कहलाये गोपाल।२।

गौमाता से ही मिले, दूध-दही, नवनीत।
सबको होनी चाहिए, गौमाता से प्रीत।३।

गइया के घी-दूध से, बढ़ जाता है ज्ञान।
दुग्धपान करके बने, नौनिहाल बलवान।४।

कैमीकल का उर्वरक, कर देगा बरबाद।
फसलों में डालो सदा, गोबर की ही खाद।५।

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