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रविवार, 8 अक्तूबर 2017

दोहे "सबका अटल सुहाग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरी माता जी रहीं, जब तक मेरे साथ।
रहता था मेरे सदा, सिर पर उनका हाथ।१।

माता ने सिखला दिये, बहुओं को सब ढंग।
सीख गयीं बहुएँ सभी, त्यौहारों के रंग।२।

करवा पूजन की कथा, जब भी आती याद।
पति की लम्बी उमर की, वो करती फरियाद।३।

जन्म-ज़िन्दग़ी भर रहे, सबका अटल सुहाग।
बेटे-बहुओं में रहे, प्रीत और अनुराग।४।

चन्दा-करवा का रहा, युगों-युगों से साथ।
नारी के सौभाग्य पर, चन्दा का है हाथ।५।

सजना का उसके रहे, सुन्दर-स्वस्थ शरीर। 
करती सजनी कामना, लिए कलश में नीर।६।

4 टिप्‍पणियां:

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