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मंगलवार, 22 मई 2018

दोहे "वृद्ध पिता मजबूर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


करके सभी प्रयास अब, लोग गये हैं हार।
काशी में उलटी बहे, गंगा जी की धार।।

पूरी ताकत को लगा, चला रहे पतवार।
लेकिन फिर भी नाव तो, नहीं लग रही पार।।

एक नीड़ में रह रहे, बोल-चाल है बन्द।
भाई-भाई की उन्हें, सूरत नहीं पसन्द।।

पुत्र पिता को समझता, बैरी नम्बर एक।
मतलब तक ही हैं यहाँ, सब परिवारी नेक।।

खून पिलाकर पालता, जीवनभर है बाप।
लेकिन बदले में उसे, मिलता है सन्ताप।।

यौवन के अभिमान में, बहुएँ-बेटे चूर।
माता की चलती नहीं, वृद्ध पिता मजबूर।।

अवसर कभी न चूकते, करते को अपमान।
मात-पिता का चुकाते, वो ऐसे अहसान।।

जिनके लिए कृपण बने, किया महल तैयार।
अपशब्दों की वो करें, रोज-रोज बौछार।।

कहीं किसी भी हाट में, बिकती नहीं तमीज।
वैसा ही पौधा उगे, जैसा बोते बीज।।

पूर्व जन्म में किसी का, खाया था जो कर्ज।
उसको सूद समेत अब, लौटाना है फर्ज।।

जो रखता मन में नही, किसी तरह का मैल।
वो खटता है रात-दिन, ज्यों कोल्हू का बैल।।
   

सोमवार, 21 मई 2018

बालकविता "आम और लीची का उदगम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

हरीलाल और पीली-पीली!
लीची होती बहुत रसीली!!
 
गायब बाजारों से केले।
सजे हुए लीची के ठेले।।
 
आम और लीची का उदगम।
मनभावन दोनों का संगम।।
 
लीची के गुच्छे हैं सुन्दर।
मीठा रस लीची के अन्दर।।
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गुच्छा बिटिया के मन भाया!
उसने उसको झट कब्जाया!!
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लीची को पकड़ादिखलाया!
भइया को उसने ललचाया!!
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भइया के भी मन में आया!
सोचा इसको जाए खाया!!
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गरमी का मौसम आया है!
लीची के गुच्छे लाया है!!
IMG_1177 
दोनों ने गुच्छे लहराए!
लीची के गुच्छे मन भाए!!
 

रविवार, 20 मई 2018

दोहे "गीदड़ और विडाल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

रास न आयी दलों को, महामहिम की चाल।
करनाटक में कमल का, सूख गया है ताल।।

न्यायालय ने कर दिये, सपने चकनाचूर।
ढाई दिन में हो गये, वो सत्ता से दूर।।

नहीं किसी के पक्ष में, आया जन आदेश।
नूरा कुश्ती का बना, करनाटक प्रादेश।।

कल तक उनको थी नहीं, उनकी तो दरकरार।
मिल कर दोनों आज वो, बना रहे सरकार।।

मछुआरों ने ताल में, फेंक दिया है जाल।
माल देखकर मिल गये, गीदड़ और विडाल।।

नहीँ एक सी नीतियाँ, नहीं एक सा ढंग।
मजबूरी के साथ में, नहीं निभेगा संग।।

आपस में करते रहे, जो कल तक थे जंग।
बदल रहे हैं आज वो, गिरगिट जैसा रंग।।

शनिवार, 19 मई 2018

दोहे "वो ही अधिक अमीर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


बिकते हैं बाजार में, जिनके रोज जमीर।
छल-बल से होते यहाँ, वो ही अधिक अमीर।।

फाँसी खा कर रोज ही, मरते जहाँ किसान।
बोलों किस मुँह से कहें, अपना देश महान।।

माना है प्यारी धरा, जीवन का आधार।
लेकिन पौधों से नहीं, करता कोई प्यार।।

सजते हों गुलदान में, जब कागज के फूल।
उजड़ा गुलशन हो भला, कैसे अब अनुकूल।।

जनमानस पर कर रहे, जो अगणित अहसान।
सबका भरते पेट हैं, वो श्रमवीर किसान।।

सीमाओँ पर दे रहे, जो अपना बलिदान।
रक्षा में संलग्न हैं, हरदम वीर जवान।।

अभिनन्दन-वन्दन करें, आओ मन से आज।
आज किसान-जवान से, जीवित सकल समाज।।

शुक्रवार, 18 मई 2018

ग़ज़ल "बड़ा वतन होता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जो पीड़ा में मुस्काता हैवही सुमन होता है
नयी सोच के साथ हमेशानया सृजन होता है

जब आतीं घनघोर घटायेंतिमिर घना छा जाता
बादल छँट जाने पर निर्मलनीलगगन होता है

भाँति-भाँति के रंग-बिरंगेजहाँ फूल खिलते हों
भँवरों का उस गुलशन मेंआने का मन होता है

किलकारी की गूँज सुनाई देजिस गुलशन में
चहक-महक से भरा हुआ. वो ही आँगन होता है

हो करके स्वच्छन्द जहाँखग-मृग विचरण करते हों
सबसे सुन्दर और सलोनावो मधुवन होता है

जगतनियन्ता तो धरती केकण-कण में बसता है
चमत्कार जो दिखलाता हैउसे नमन होता है

कुदरत का तो पल-पल में ही, 'रूपबदलता जाता
जाति-धर्म की दीवारों सेबड़ा वतन होता है 
 

गुरुवार, 17 मई 2018

गीत "रिश्ते ना बदनाम करें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

पहले काम तमाम करें।
फिर थोड़ा आराम करें।।

आदम-हव्वा की बस्ती में,
जीवन के हैं ढंग निराले।
माना सबकुछ है दुनिया में,
पर न मिलेगा बैठे-ठाले।
नश्वर रूप सलोना पाकर,
काहे का अभिमान करें।
पहले काम तमाम करें।
फिर थोड़ा आराम करें।।

सागर है जलधाम कहाता,
लेकिन स्वाद बहुत है खारा
प्यास पथिक की सदा बुझाती,
कलकल-छलछल करती धारा।
खुद खायें, औरौं को खिलाये,
जमा न ज्यादा दाम करें।
पहले काम तमाम करें।
फिर थोड़ा आराम करें।।

सोना उसको ही मिलता है,
जिसने सोना त्याग दिया।
उसका ही जग हो जाता है,
जिसने भी अनुराग किया।
सम्बन्धों को सदा निभायें,
रिश्ते ना बदनाम करें।
पहले काम तमाम करें।
फिर थोड़ा आराम करें।।

बुधवार, 16 मई 2018

दोहे "रमजान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



नेकी और खुलूस है, मौला का फरमान।
मौमिन को सन्देश ये, देते हैं रमजान।।

पाँचों वक्त नमाज पढ़, कहता पाक कुरान।
बुरा किसी का सोच मत, सिखलाते रमजान।।

नाम इबादत के अलग, देश-काल अनुरूप।
लेकिन मक़सद एक है, अलग भले हों रूप।।

जर्रे-जर्रे में बसा, राम और रहमान।
सिखलाते इंसानियत, पूजा और अजान।।

मर्म बताते धर्म का, गीता और कुरान।
सारे प्राणी धरा के, ईश्वर की सन्तान।।

खुद जिसके आदेश पर, चलता सकल जहान।
बन्धन में रहता नहीं, खुदा और भगवान।।

सारी पोथी धर्म की, करती हैं ताक़ीद।
जिसके मन में प्यार है, उसके सभी मुरीद।।

मज़हब चाहे कोई हो, करना सबका मान।
भाईचारे से बने, अपना देश महान।।

मंगलवार, 15 मई 2018

दोहे "रोटी है तकदीर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बाहर खाने में नहीं, आता कोई स्वाद।
होटल में जाकर सदा, होता धन बरबाद।।

फूली-फूली रोटियाँ, सजनी रही बनाय।
बाट जोहती है सदा, कब साजन घर आय।।

फूली रोटी देखकर, होते सब अनुरक्त।
मगर काटते तो नहीं, हँसी-खुशी से वक्त।।

घर के खाने में भरा, घरवाली का प्यार।
सजनी खाने के लिए, करती है मनुहार।।

बना रहे खुशहाल ही, जीवन का परिवेश।
रोटी-रोजी के लिए, जाते लोग विदेश।।

दौलत के बाजार में, बिकते रोज रसूख।
रोटी की कम भूख है, धन की ज्यादा भूख।।

रोटी सबका लक्ष्य है, रोटी है तकदीर।
जग में रोटी के बिना, चलता नहीं शरीर।।

खाकर माल हराम का, करना मत आखेट।
श्रम से अर्जित रोटियाँ, भरती सबका पेट।।
  

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