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रविवार, 13 मई 2018

गीत "याद बहुत माँ आती है" (रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

ममता की मूरत माता की,
हरदम याद सताती है।
कष्ट-क्लेश दुख की घड़ियों में,
याद बहुत माँ आती है।।

जीव-जन्तुओं को भी होते,
बच्चे प्राणों से प्यारे।
सुत हों या हो सुता,
जननि की आँखों के होते तारे।
नजर-टोक का लगा डिठोना,
माँ कितना सुख पाती है।
कष्ट-क्लेश दुख की घड़ियों में,
याद बहुत माँ आती है।।

माँ खुद गीले में सोई,
सूखे में हमें सुलाया है।
रूखा-सूखा भोजन खाकर,
अपना दूध पिलाया है।
बच्चों में बच्चा बनकर माँ,
उनको खेल खिलाती है।
कष्ट-क्लेश दुख की घड़ियों में,
याद बहुत माँ आती है।।

रिश्ते-नाते हमें बताती
सिखलाती जो भाषा है।
सरल-सरल होकर भी माँ की,
बहुत कठिन परिभाषा है,
माता ही तो सामवेद बन,
लोरी हमें सुनाती है।
कष्ट-क्लेश दुख की घड़ियों में,
याद बहुत माँ आती है।।

नहीं उऋण हो सकता कोई,
माता के उपकारों से।
इसीलिए माँ की महिमा को
गाते सब जयकारों से।
परमपिता से भी महान,
माता जग में कहलाती है।
कष्ट-क्लेश दुख की घड़ियों में,
याद बहुत माँ आती है।।  

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (14-05-2017) को "माँ है अनुपम" (चर्चा अंक-2970) ) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

    उत्तर देंहटाएं
  2. आदरणीय सर -- माँ की स्नेहमयी और ममतामयी स्मृतियों का भावपूर्ण स्मरण | सचमुच माँ से बेहतर कौन ? सदर

    उत्तर देंहटाएं

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