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सोमवार, 14 मई 2018

दोहे "रखना सम अनुपात" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

होते गीत-अगीत हैं, कविता का आधार।
असली लेखन है वही, जिसमें हों उदगार।।
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मंजिल पर हर कदम का, रखना सम अनुपात।
स्वारथ से बनती नहीं, जग में कोई बात।।
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जो भूखा हो ज्ञान का, दो उसको उपदेश।
जितने से जीवन चले, उतना करो निवेश।।
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तालाबों की पंक में, खिले कमल का फूल।
वो ही तो परिवेश है, जो होता अनुकूल।।
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चन्दा से है चाँदनी, सूरज से है धूप।
सबका अपना ढंग है, सबका अपना रूप।।
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थोड़े से पीपल बचे, थोड़े बरगद-नीम।
इसीलिए तो आ रहे, घर में रोज हकीम।।
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परछाई में देखते, लोग यहाँ तसबीर।
थोड़े दिन की ही बची, पुरखों की जागीर।।

2 टिप्‍पणियां:

  1. थोड़े दिन की ही बची, पुरखों की जागीर।।
    -लेकिन इस जागीर को सुरक्षित रखना हमारा फ़र्ज़ है-अच्छा चेताया आपने .

    उत्तर देंहटाएं

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